: ए फॉर एप्पल की जगह अर्जुन और बी फॉर बलराम की तैयार हुई नई वर्णमाला
Thu, Nov 3, 2022
नई वर्णमाला को लोग बेहद पसंद कर रहे
ए से लेकर जेड तक के शब्द भारतीय पौराणिक संस्कृति व इतिहास से लिए गए
कमला देवी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य संत प्रसाद मिश्रा कहते है अधिवक्ता को सामने आना चाहिए, प्रकाशकों को यह नई संकल्पना पसंद आ रही
लखनऊ। ए फॉर एप्पल की जगह अर्जुन और बी फॉर बलराम की नई वर्णमाला को लोग बेहद पसंद कर रहे हैं। आपको बता दें कि आमतौर पर बच्चे अंग्रेजी की वर्णमाला में ए फॉर एप्पल और बी फॉर ब्वॉय पढ़ते आए हैं लेकिन अब बच्चे ए फॉर अर्जुन और बी फॉर बलराम भी पढ़ सकते हैं। शिक्षकों के सोशल मीडिया ग्रुप पर ऐसी ही अंग्रेजी वर्णमाला का खूब प्रसार किया जा रहा हैं। इसमें ए से लेकर जेड तक के शब्द भारतीय पौराणिक संस्कृति व इतिहास से लिए गए हैं। आपको बता दे अंग्रेजी वर्णमाला से संबंधित इस तरह की शब्दावली सीतापुर निवासी एक अधिवक्ता ने तैयार की है, लेकिन वह सामने आने पर कतरा रहे हैं।
कमला देवी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य संत प्रसाद मिश्रा ने बताया कि अधिवक्ता ने इसे बनाया तो है, लेकिन इसको लेकर वह मीडिया के सामने नहीं आना चाहते हैं। लेकिन प्रकाशकों को भी यह नई संकल्पना पसंद आ रही है और मेरठ के एक प्रकाशक ने इसे प्रकाशित करने का निर्णय लिया है।
शिक्षकों का भी कहना है कि यह बच्चों के लिए अलग तरह का अनुभव होगा और इससे वे बालपन में ही भारतीय संस्कृति से रूबरू हो सकेंगे। सोशल मीडिया पर इस तरह की अंग्रेजी वर्णमाला की पीडीएफ फाइल उपलब्ध है। इसमें शब्दों से संबंधित फोटो भी उपलब्ध हैं। साथ में संबंधित शब्द का वर्णन भी दिया गया है। उदाहरण के तौर पर ए फॉर अर्जुन है तो अर्जुन के बारे में भी एक वाक्य में वर्णन दिया गया है।
इस तरह है अंग्रेजी वर्णमाला की शब्दावली
ए - अर्जुन
बी- बलराम
सी - चाणक्य
डी - ध्रुव
ई - एकलव्य
एफ - फोर वेद
जी - गायत्री माता
एच - हनुमान
आई - इंद्र
जे - जटायु
के - कृष्ण
एल - लव-कुश
एम - मार्कंडेय
एन- नारद
ओ - ओमकार
पी - प्रहलाद
क्यू - क्वीन गांधारी
आर - राम
एस - सूर्य
टी - तुलसी
यू - उद्धव
वी - वमनावतार
डब्ल्यू - वाटर गंगा
एक्स - क्षीरब्दी द्वादशी
वाई - यशोदा
जेड - जामवंत
: समाजवाद का सूरज आईसीयू में !
Fri, Oct 7, 2022
देश की सियासत के इंजन मुलायम सिंह यादव
भाजपा के भी रफीक़ रहे "रफीकुल मुल्क" मुलायम सिंह यादव
ज़िन्दगी और मौत से लड़ रहे मुलायम सिंह यादव की जीत हो, वो जल्दी स्वस्थ हों, यही हर आम और ख़ास की कामना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके शीघ्र स्वस्थ होने की प्रभु राम से कामना की है। नेता जी मुलायम सिंह यादव की हालत क्रिटिकल बनी हुई है। गुरुग्राम स्थित वेदांता अस्पताल मे उनका इलाज चल रहा है। उनकी हालत में सुधार के लिए लोग दुआएं कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर समाजवादी कुछ ज्यादा ही भावुक हैं। कोई लिख रहा है- समाजवाद का सूरज आईसीयू में। तो कोई कह रहा है-गुरुग्राम ध्यान रखना, हमारा ख़ुदा तुम्हारी हिफाज़त में है।
एक बुजुर्ग बोले- नेता जी बहुत सख्त जान हैं। हर मुश्किल वक्त को पछाड़ देता है ये पहलवान। ये जंग भी जीत जाएंगे।
बुजुर्ग की बात में दम है। सियासी सफर में तो मुलायम हर सख्त वक्त को मुलायम करने में माहिर रहे हैं। बुरे से बुरे वक्त को अच्छे वक्त में कन्वर्ट करना उन्हें खूब आता है। बहुत सारे खूबियों में एक खूबी ये भी है कि अपने तो अपने विरोधियों के लिए भी वो मददगार रहे हैं। शायद इसीलिए आज नेता जी के समर्थक ही नहीं विरोधी भी उनके स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना कर रहे हैं। क्योंकि वो समर्थकों के ही नहीं धुरविरोधियों के भी रफीक़ रहे हैं।
रफीक़ का अर्थ है- साथी, सहयोगी, मददगार, दोस्त, सहायक..। मुलायम सिंह यादव को "रफीक़ुल मुल्क" का ख़िताब शायद इसीलिए दिया गया क्योंकि वो सिर्फ मुल्क के ही मददगार नहीं बल्कि उनकी राजनीति इनके विरोधी दल भाजपा तक के लिए भी मददगार साबित हुई।
उन्हें सिर्फ नेता कहना नाकाफी है।देश की सियासत पर असर छोड़ने की तासीर का नाम भी मुलायम सिंह यादव है। आजादी के बाद करीब चार दशक तक यूपी में एकक्षत्र राज करने वाली किसी पार्टी (कांग्रेस) का वर्चस्व तोड़ने की क़ूबत का नाम भी मुलायम है। यूपी में बहुजन समाज की जड़ों को दोस्ती का खाद-पानी देकर बसपा को पहली बार सत्ता में सहभागिता दिलाने और यूपी में पहले सियासी तालमेल की जादूगरी का नाम भी मुलायम है। धरती पुत्र, रफीकुल मुल्क और नेता जी के नाम से भी ये ज़मीनी नेता की पहचान है।
आज़ादी के बाद तीस-चालीस बरस तक ठीक से रेंग पाने में भी अक्षम भाजपा की गाड़ी को रफ्तार देने के ईंधन का नाम भी मुलायम सिंह यादव है। राजनीतिक पंडित कहते हैं कि अयोध्या विवाद और वीपी सिंह की मंडल-कमंडल को मुलायम सिंह रंग ना देते तो शायद आज भाजपा इस मुकाम पर न होती। सियासत में रिवर्स गेम की एजाद करने वाले मुलायम एम-वाई फेक्टर में जितना आगे बढ़े उससे कई गुना आगे धीरे-धीरे भाजपा कुछ ऐसे बढ़ी कि वो आज पूरे देश में सबसे ताकतवर पार्टी बन गई। समाजवादी पार्टी ना होती तो शायद भाजपा की सियासी पिक्चर अस्सी-बीस के मसाले से सुपरहिट न होती।
यूपी में क्षेत्रीय राजनीति का दौर शुरू करने से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की शिल्पकारी में अपनी हुनरमंदी दिखाने वाले मुलायम सिंह ने क्षेत्रीयता की सरहदों से निकल कर अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई। दिलचस्प बात ये रही कि सियासत की क्षितिज पर ये शख्सियत इतनी असरदार रही कि इनका विरोध भी नेता बना देने का माद्दा रखता था। अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलने का दुखद पहलू हो या गेस्टहाऊस कांड हो, इन दोनों वाक़ियो को याद दिलाकर क्रमशः भाजपा और बसपा जैसे दल बार-बार सियासी लाभ लेते रहे। समर्थकों ने जहां इनको धरती पुत्र और रफीकुल मुल्क जैसे खिताबों से नवाजा वहीं विरोधियों ने इनपर मुल्ला मुलायम के फिरक़े कसे और मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाए। कहा जाता है कि भाजपा को मुलायम का विरोध ख़ूब रास आया और मुलायम का राजनीतिक क़द भी भाजपा की वजह से ही बढ़ा। इसी तरह बसपा और सपा की दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही समय समय पर दोनों दलों को राजनीतिक फायदा देती रही।
कांग्रेस से भी सपा का अद्भुत रिश्ता रहा। यूपी से कांग्रेस को साफ करने वाली सपा ने केंद्र में यूपीए सरकार का समर्थन भी किया। बतौर रक्षा मंत्री मुलायम ने बोफोर्स मामले को दबाने की भी कोशिश की थी।
सरकारी एजेंसियों द्वारा विरोधियों को डराने-दबाने की तोहमतें आज मोदी सरकार पर खूब लगती हैं। भाजपा सरकार से पहले केंद्रीय सत्ता पर ऐसे आरोपों लगाने की परंपरा मुलायम सिंह यादव ने शुरू की थी। वो कांग्रेस की सीबीआई जैसी एजेंसियों के जरिए यूपीए सरकार उन क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं को डराने और दबाने की कोशिश करती है जो सरकार की समाज-विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं। सपा के मुताबिक एजेंसियों के दुरुपयोग की परिपाटी कांग्रेस ने शुरू की थी।
गरीबों, किसानों, मेहनतकशों,नौजवानों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के हक़ की लड़ाई लड़कर भारतीय राजनीति में समाजवाद का परचम लहराने वाले मुलायम ने बतौर रक्षा मंत्री चीन को दुश्मन नंबर वन माना था और हमेशा उससे सावधान रहने की नसीहत दी थी। छात्र राजनीति को बढ़ावा देने से लेकर देश की रक्षा नीति में उन्होंने अपनी राजनीतिक दक्षता साबित की।
अपने राजनीतिक सफर में सोशलिस्ट पार्टी और फिर जनता पार्टी में रहने के बाद समाजवादी पार्टी का गठन करने वाले धरती पुत्र ने तीन बार मुख्यमंत्री से लेकर रक्षामंत्री की कुर्सी हासिल की।
शिक्षक और गांव का एक पहलवान सन 60 में डाक्टर राम मनोहर लोहिया के सोशलिस्ट आंदोलन से जुड़ा और फिर समाजवाद का ये सूरज चमकता ही रहा। 1969 में जसवन्तनगर से ये पहली बार बहुत कम उम्र के विधायक चुने गए। फिर जनता पार्टी में राजनीतिक सफर समाजवादी पार्टी के गठन तक पंहुचा। ये वही समय था जब राम मंदिर आंदोलन शुरू हो गया था। कांग्रेस और भाजपा की सीधी लड़ाई ख़ासकर यूपी मे कांग्रेस को नेपथ्य में डाल रही थी। अयोध्या विवाद के टकराव के भीषण काल में भाजपा और सपा भारतीय राजनीति के दो ऐसे किनारे थे जो विचारधारा के मामले में भले ही एक दूसरे के विपरीत थे लेकिन दोनों को अयोध्या बराबर का फायदा दे रही थी।
कल से लेकर आजतक समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी पार्टी भाजपा रही। लेकिन भाजपा के सबसे बड़े नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करके और लोकसभा चुनाव से पहले संसद में भाजपा के सांसदों को दुबारा जीतने की शुभकामनाएं देकर मुलायम ने एक बार सबको चौकाया और कटुता से दूर रहकर राजनीति में शिष्टाचार का एतिहासिक संदेश दिया था।
भारतीय राजनीति को एक नए क़िस्म की ऊर्जा देने और लोकतंत्रिक सौंदर्य में निखार लाने के लिए प्रतिद्वंदता को कटुता से दूर रखना, विरोध के रिश्तों में भी नैतिकता और शिष्टाचार की खूबसूरती बरकरार रखने वाले विरले नेताओं में शामिल मुलायम सिंह अपनी तमाम खूबियों की वजह से नेता जी के खिताब से नवाजने गए। नेता जी सुभाष चंद्र बोस के बाद नेता जी के नाम से जाने जाने वाले दूसरे नेता मुलायम न सिर्फ समाजवादियों के बल्कि भारतीय राजनीति के नेता के रूप में स्थापित हुए। डा. राममोहन लोहिया का ये शिष्य ऐसे ही नेता जी नहीं कहलाया। इनमें वो तासीर थी कि इनका समर्थन करने वाले न जाने कितने लोग नेता बन गए, यही नहीं नेता जी का विरोध भी कईयों को इतना रास आया और विरोधी भी स्थापित नेता बन गए।
सपा ही नहीं कांग्रेस, भाजपा और बसपा जैसे दलों के उतार-चढ़ाव में नेता जी मुलायम सिंह यादव की सियासत का ख़ूब रंग दिखाई देता रहा। पूरे राजनीतिक करियर में भाजपा को वोट सबसे ज्यादा रास आए, शायद इसीलिए आज भाजपा के सबसे बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े नेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मुलायम के प्रति मुलायम रिश्ता समय-समय पर नजर आता रहा। नवेद शिकोह
: मर्ज़ ढूंढिए और इलाज करके सफल होइए अखिलेश जी !
Fri, Jul 1, 2022
आज डाक्टर दिवस है और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का जन्मदिन भी।
सत्ता या जीत आपके साथ हो तो लोग आपकी खूबियों और प्रशंसा का हार आपको बारंबार पहनाते है। आपकी हार हों तो वही लोग आपकी कटु आलोचना भी सबसे अधिक करते हैं। ऐसी मानव प्रवृत्ति दुनिया का नियम सा बन गई है।
हार आपकी कमियों की शिनाख्त कर दे तो हार नेमत है। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े विपक्षी दल के सबसे बड़े विपक्षी नेता अखिलेश यादव के गले से हार के कांटों का हार उतर ही नहीं रहा है। हार का एक हार पुराना नहीं होता तो हार का दूसरा ताज़ा हार आ जाता है।
हांलांकि हार की अपनी अलग एहमियत है। ये आईना है, खुद की कमियों और दूसरों की फितरत जानने का। अपनों और परायों को पहचानने का। कमियों की शिनाख्त कर दे तो हार तो जीत से भी बड़ी नेमत है।
डाक्टर को इसीलिए भगवान का दर्जा दिया जाता है क्योंकि वो आपके जिस्म की कमियों की शिनाख्त करता है और फिर दवा तज़वीज़ करता है।
अखिलेश जी आज आपका जन्मदिन है और डाक्टर दिवस भी है, आज से आप प्रण कीजिए की आप अपनी कमियों को स्वीकारेंगे और इसे खत्म कर देंगे। फैसला कीजिए कि आप को लेकर हो रही आलोचनाओं की बौछारों की एक-एक बूंद पर आप विचार करेंगे। निश्चित तौर पर सफलता आपके क़दम चूमेगी।
एक तरह देखिए तो किसी बड़े राजनेता के लिए सत्ता से बाहर रहने के वक्त सुधार का स्वर्ण काल होता है। यही वो दौर है जब आलोचक आपकी खुल कर आलोचना करते हैं, आपकी कमियां निकालते हैं। आपकी बुराइयों को निडर होकर आपके सामने रखते हैं। विपक्षी जब सत्ता में आ जाता है तो आलोचक का कलम आलोचना छोड़ प्रशंसा के मोड में आ जाता है। (मैं भी इनमें से ही हूं) ये उसकी पेशेवर मजबूरी मान लीजिए या कमजोरी, ये अलग विषय है।
लोकप्रिय नेता अखिलेश यादव तमाम कारणों से जाने जाते हैं। वो खुशमिजाज और मिलनसार हैं। वो समाजवादी पार्टी के संस्थापक और यूपी में कई बार मुख्यमंत्री रहने वाले खाटी समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं।
दूसरी बहुत सारी पहचानें हैं- पूर्व मुख्यमंत्री हैं। यूपी के सबसे बड़े सूबे के सबसे बड़े विपक्षी दल के सुप्रीमों हैं, यहां के सबसे बड़े विपक्षी नेता हैं। भाजपा जैसे सत्तारूढ़ और ताकतवर पार्टी को सीधी टक्कर देने की ताकत रखते हैं। समाजवादी नेताओं की सामाजिक लड़ाई की विरासत संभाल रहे हैं।
जब वो मुख्यमंत्री थे तो इतने विकास कार्य किए थे वो अपने आप में मिसाल है।
फिलहाल अखिलेश जी की कमियों, खामियों और लापरवाहियों की चर्चाएं आजकल उनके अपने ही कर रहे हैं।
आलोचकों का तकिया कलाम है- अखिलेश ट्वीट वाले, एसी वाले नेता हैं। जमीनी संघर्ष नहीं करते, आंदोलन नहीं करते। अक्सर मीडिया के साथ मिसबिहेव करते हैं। पांच-सात सलाहकारों कि गलत सलाह उनको बार-बार नाकाम कर रही है। लोगों से मिलते नहीं, अपने पिता के साथ के पुराने समाजवादियों को मुंह नहीं लगाते।
सबसे बड़ा इल्जाम तो ये है कि उन्होंने अपने चाचा के साथ न्याय नहीं किया।
आजमगढ़ और रामपुर के चुनाव में प्रचार पर न निकल कर तो उन्होंने हद कर दी। टिकट कटने या किसी दूसरे कारणों से नाराज़ रूठों को मनाने की कोशिश भी नहीं की। हार के बाद भी घमंड बढ़ता जा रहा है।
विरोधियों या भाजपाइयों, कांग्रेसियों, बसपाइयों, विश्लेषकों, राजनीतिक पंडितों, पत्रकारों या आम जनता के ही आरोप नहीं ऐसी बातें अब समाजवादी भी करने लगे हैं।
आजमगढ़ और रामपुर में सपा की हार पर एक टीवी चैनल पर डिबेट में अखिलेश जी की कमियों को गिना रहा था, डिबेट में सपा प्रवक्ता हर बात पर असहमति जता रहा थे। डिबेट खत्म हुई और हम स्टूडियो से निकले तो लिफ्ट में सपा प्रवक्ता मेरे साथ थे। बोले- सर आप सही बात रख रहे थे, भइया (अखिलेश यादव) वाक़ई बार-बार गलती पर गलती कर रहे हैं। गुड्डू जमाली मिलना चाहते थे, नहीं मिले। अब भाजपा से मुकाबला करना आसान नहीं है..
ये बातें अपनी जगह है, पूरी सही हैं या ग़लत नहीं कहा जा सकता। पर ये सच है कि मुलायम सिंह यादव जैसे समाजवादिया का मूल स्वभाव और आधार ज़मीनी संघर्ष था, जेल से डरना नहीं जेल भरना था।
ख़ैर अखिलेश यादव जी में बहुत सारी खूबियां भी हैं, विज़न है। उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री यूपी को बहुत कुछ दिया। यूपी के 2022 विधानसभा चुनाव में उन्होंने खूब मेहनत भी की, पसीना बहाया और भाजपा जैसे ताकतवर और जबरदस्त जनाधार वाले सत्तारूढ़ दल से वो डट कर लड़े।
यदि सपा मे वन मैंन के बजाय सेकेंड लीडरशिप तैयार की जाए, शिवपाल यादव जैसे संगठन मास्टर परिपक्व तमाम नेताओं पर विश्वास क़ायम किया जाए। सभी कार्यो़ की मोनीटरिंग खुद करें लेकिन संगठन के लोगों को फैसला करने का हक दें।
भाजपा से संगठनात्मक ढांचा तैयार करने का सलीका सीखें। संगठन की अलग-अलग लेयर तैयार करें। जिम्मेदारियां बांट दें। और दूसरे सपा नेताओं पर विश्वास करने का सलीका सीखें तो समाजवादियों को असफलताओं से छुटकारा मिल सकता है।
ख़ैर,अखिलेश यादव जी को जन्मदिन की मंगलकामनाएं। आप खूब मेहनत कीजिए सफल होइए और उत्तर प्रदेश में विपक्ष को हाशाए पर आने या शून्य की ओर जाने से बचाइए। लोकतंत्र में जनता के हितों के लिए विपक्ष का मज़बूत होना बेहद ज़रूरी है।
पुनः शुभकामनाएं