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: जिसका धैर्य और संतोष खो जाता है, वह लुट जाता है: इन्द्रदेवजी सरस्वती

बमबम यादव

Thu, Apr 7, 2022

क्रांतिकारी युगप्रवर्तक यज्ञपीठाधीश्वर विद्यावाचस्पति ने कहा, मनुष्य का कल्याण कलेक्टर या प्रधानमंत्री बनने से नहीं होगा, मनुष्य का कल्याण तब होगा जब वह शिष्य बन जाएगा

रामकथा में उमड़ा भक्तों का भारी हुजूम
श्रीमहंत धर्म दास का अभिनन्दन करते स्वामीजी

अयोध्या। गौ सेवार्थ श्री राम कथा एवं पारायण के अवसर पर आज क्रांतिकारी युगप्रवर्तक यज्ञपीठाधीश्वर विद्यावाचस्पति संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज के मुखारविंद से सरयू रूपी श्री राम कथा की रसधारा प्रवाह का षष्ठम दिवस था। आज की कथा में निर्वाणी अखाड़ा के श्रीमहंत धर्मदास महाराज पहुंचे। इन्द्रदेवजी सरस्वती जी ने अयोध्या में विराजमान सभी तीर्थों को नमन करते हुए आज की कथा का प्रारंभ किया। साथ ही कथा के यजमान परिवार बड़गुजर का भी धन्यवाद किया।
आपको विदित हो कि कनक महल में 6 अप्रैल को आयोजित विगत सन्त महासम्मेलन में 50 की संख्या में महंत और अनेकों संतों का परम मंगल आगमन हुआ था।आज की कथा में सन्त इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज ने बताया कि 80% जनता तुलसीदास जी की रामायण सुनते हैं। सन्तों के दर्शन करने, राम जी के चरणों का ध्यान करने से जटिल कलंक भी मिट जाता है जिसका धैर्य और संतोष खो जाता है, वह लुट जाता है।
महाराज जी ने कहा कि उन्हें 600-700 वर्षों पूर्व के अनुभव हैं।आगे पूज्य चरण बताते हैं कि जिसने पिछले जन्म में दान-पुण्य न किया कभी उसे इस जन्म में भी कोई  मिलेगा। जो बच्चा बाल्यकाल में 5 वर्ष से 25 वर्ष के बीच ब्राह्मण वर्ण अर्थात गुरुकुल में जीवन व्यतीत कर लेता है, उसे आगे जाकर अपने वर्ण के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। बड़े कठिन वचनों में कहना पड़ता है कि विद्वान भी आपस में एक दूसरे को पीठ-पीछे अपशब्द कहते हैं। किसी भी यज्ञ में ब्रह्मा और अध्वर्यु अर्थात नाई/शूद्र बराबरी से उपस्थित होता है, तो दोनों में अंतर क्यों है, ऐसा श्री संत जी ने प्रश्न किया।कोई शिष्य बिना सन्ध्या के, बिना यज्ञ किये जो जल भी नहीं पीता, वह समस्त धातुओं का स्वामी बन जाता है। ब्राह्मणों के समस्त सिद्धांतों के उचित पालन का सदा आदेश करनेवाले एवं समाज को भारतीय संस्कृति की अलख जगाने वाले संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी ने कहा कि रामायण इस बात का प्रमाण है कि प्रभु श्री राम त्रिकाल सन्ध्या करते थे। राम जी जब अयोध्या में भगवान बनकर लौटे हैं अपने गुरु आश्रम से, तब दीपक लगाए गए थे। भिक्षाटन करने से बच्चे की इच्छा मर जाती है, तभी वे विद्यार्थी बन पाते हैं। जिसे सुख की भूख हो उसे विद्या नहीं आती। भाग्यशाली होते हैं वो विद्यार्थी जिनकी विदाई गुरु आश्रम से होती है।उन्होंने कहा कि मनुष्य का कल्याण कलेक्टर या प्रधानमंत्री बनने से नहीं होगा, मनुष्य का कल्याण तब होगा जब वह शिष्य बन जाएगा। जब वह गुरु आज्ञा में चलता है।जो खोटा सिक्का गुरु के यहां नहीं चल सकता, वह कहीं और नहीं चल सकता। एक केवल यज्ञ का भी नियम पकड़ लो तो आपका तेज, ओज आदि सब प्राप्त हो जाता है। माता-पिता और गुरु चेतन देवता हैं।आपके द्वारा थाली में भोग लगाना आधा-अधूरा भोग है, यज्ञ में आहुति डालकर असल भोग लगाना चाहिए, क्योंकि "अग्नि देवानां  मुखं"।
स्वामीजी ने कहा कि विवाह में साधुओं का पधारना बहुत आवश्यक है, चाहे कुछ लोग कम हो जाएं। आयुध का प्रयोग करने से पहले, भगवान का ध्यान कर लेना चाहिए। आज की कथा में जानकी मैया का स्वयंवर हुआ।
बताते चलें कि कथा तो सब जगह होती है और कथावाचक भी सभी होते हैं, परन्तु यह अद्भुत दरबार है। यहाँ कथा से पूर्व प्रातःकालीन सभा तथा कथा के पश्चात संध्या बेला में संत इन्द्रदेवजी सरस्वती जी महाराज जी के श्रीचरणों में बैठकर समस्त भक्तवृंद दर्शन ले रहे हैं, गुरु-दीक्षा प्राप्त कर रहे हैं एवं जो जीवन से त्रस्त और परेशान हैं, वे अपने जीवन में आनेवाली समस्त भौतिक, आध्यात्मिक, मानसिक समस्याओं का समाधान पा रहे हैं। उक्त कथा का प्रतिदिन दोपहर में 1 से 4 बजे तक संस्कार चैनल पर लाइव प्रसारण हो रहा है। साथ ही यह सूचना भी जारी की गई कि 10 अप्रैल को आयोजित श्री राम कृपा महायज्ञ में सभी अपनी निश्चित दक्षिणा प्रदान कर सम्मिलित हो सकते हैं ।

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