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: रामानंदाचार्य महाराज वैष्णव भक्तिधारा के महान संत थे: विंदुगाद्याचार्य

बमबम यादव

Sat, Feb 3, 2024

संकट मोचन सेना अध्यक्ष महंत संजय दास के नेतृत्व संतों ने जगद्गुरु स्वामी रामानंदाचार्य महाराज को पुष्पांजलि अर्पित कर नमन किया

हनुमत संस्कृत महाविद्यालय हनुमानगढ़ी के प्राचार्य डॉ. महेश दास ने किया ऐलान रामानन्द सम्प्रदाय के लिए संकट मोचन सेना हमेशा तैयार

अयोध्या। अयाेध्याधाम के सब्जी मंडी समीप स्थित भगवदाचार्य स्मारक भवन में शुक्रवार को जगद्गुरु स्वामी रामानंदाचार्य महाराज की 724वीं जयंती हर्षोल्लास पूर्वक मनाई। सर्वप्रथम स्वामी रामानंदाचार्य के चित्रपट पर दीप प्रज्लवन संग कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। आयाेजित संगाेष्ठी की अध्यक्षता करते हुए दशरथ महल विंदुगाद्याचार्य महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य ने कहा कि जगद्गुरू स्वामी रामानंदाचार्य महाराज वैष्णव भक्तिधारा के महान संत थे। उन्होंने हिन्दू धर्म को संगठित-व्यवस्थित करने का अथक प्रयास और वैष्णव संप्रदाय को पुनर्गठित किया। वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान दिलाया। जिनके शिष्य संत कबीर व रविदास जैसे संत रहे हों। तो वह कितने महान रहे होंगे। धर्मसम्राट श्रीमहंत ज्ञानदास महाराज के उत्तराधिकारी एवं संकटमोचन सेना राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय दास महाराज ने कहा कि स्वामी रामानंदाचार्य महाराज का जन्म माघ माह की सप्तमी संवत 1356 अर्थात ईस्वी सन् 1300 को कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम पुण्य शर्मा तथा माता का नाम सुशीला देवी रहा। उन्होंने वाराणसी पंच गंगाघाट के स्वामी राघवानंदाचार्य से दीक्षा प्राप्त किया। तपस्या तथा ज्ञानार्जन के बाद बड़े-बड़े साधु व विद्वानों पर उनके ज्ञान का प्रभाव दिखने लगा। यदि हम सभी उनके जीवन दर्शन को आत्मसात कर लें। तो हमारे देश व समाज की अनेक बुराइयों का खात्मा हो जायेगा। जगद्गुरू स्वामी रामदिनेशाचार्य ने कहा कि स्वामी रामानंदाचार्य महाराज ने भारतीय वैष्णव भक्ति धारा को पुनर्गठित किया। उन्होंने भक्ति के जिस विशिष्टाद्वैत सिद्धांत का प्रवर्तन किया। उसके बारे में कहा जाता है कि उसकी प्रेरणास्रोत मां जानकी हैं। हनुमत संस्कृत महाविद्यालय हनुमानगढ़ी के प्राचार्य डॉ. महेश दास ने कहा कि स्वामी रामानंदाचार्य महाराज ने विभिन्न मत-मतांतरों एवं पंथ-संप्रदायों में फैली वैमनस्यता को दूर करने के लिए समस्त हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोया। साथ ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को अपना आदर्श मानकर सरल राम भक्ति के मार्ग को प्रशस्त किया। रामचरितमानस विद्यापीठ के महंत कमलादास रामायणी ने कहा कि स्वामी रामानंदाचार्य की शिष्य मंडली में जहां जाति-पांति, छुआ-छूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्ति पूजा आदि के कट्टर विरोधी निर्गुण संत थे। तो वहीं दूसरी ओर अवतारवाद के पूर्ण समर्थक सगुण उपासक भी रहे। वह अपने 'तारक मंत्र की दीक्षा पेड़ पर चढ़कर दिया करते थे, ताकि वह सभी जाति-संप्रदायों व मत-मतांतरों के लोगों के कानों में पड़ सके। उनका कहना था कि 'जाति-पांति पूछे नहि कोई, हरि को भजे सो हरि का होई। उन्होंने आजीवन भक्ति और सेवा का संदेश दिया। संगाेष्ठी में निर्वाणी अनी के श्रीमहंत मुरली दास, खाकचाैक श्रीमहंत बृजमोहन दास, महंत अयोध्या दास, महंत रामकृष्ण दास रामायणी, महंत रामअवतार दास रामायणी, महंत नव्यन्यायाचार्य तुलसीदास, कथावाचक भगवान शरण, आचार्य सत्यदेव दास, महंत सियाराम शरण, महंत रामजी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस माैके पर हनुमानगढ़ी के वरिष्ठ पुजारी हेमंत दास, पहलवान राजेश दास, पहलवान मनीराम दास, महंत रामपत दास, प्रेममूर्ति कृष्णकांत दास, शिवम श्रीवास्तव, महेंद्र त्रिपाठी आदि उपस्थित रहे।

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