Saturday 22nd of August 2026

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गुरुदेव की पुण्यतिथि केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों और आध्यात्मिक विरासत को आत्मसात करने का भी अवसर -महंत

जानकी घाट  स्थित चारुशिला मंदिर में संतों ने की बैठक, अध्यक्षता चारुशिला मंदिर पीठाधीश्वर जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीराम-सीता, लक्ष्मण व हनुमानजी का पंचामृत से अभिषेक; दक्षिण भारतीय वाद्य और मशालों ने मोहा मन

स्वतंत्रता दिवस पर रायगंज स्थित स्वामी नारायण मंदिर में भगवान राधाकृष्ण व स्वामी नारायण का विशेष श्रृंगार,दर्शन को उमड़े

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता व संकट मोचन सेना अध्यक्ष महंत संजय दास के नेतृत्व व श्रृंगी ऋषि आश्रम

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: क्षुद्र-स्वार्थ और व्यक्तिगत सुख वाले कभी महापुरूष नहीं बन सकते: जीयर स्वामीजी

बमबम यादव

Mon, Jan 27, 2025
क्षुद्र-स्वार्थ और व्यक्तिगत सुख वाले कभी महापुरूष नहीं बन सकते: जीयर स्वामीजी प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमान बाग मंदिर में चल रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा का समापन सोमवार को अच्छा सोचो और अच्छा देखो अपने जीवन को स्वच्छ और पवित्र बनाओ: श्रीमहंत जगदीश दास अयोध्या। वाल्मीकि राम को महापुरुष कहकर नमन करते हैं।सच कहूँ तो महापुरूष ही नमन के योग्य है।महापुरूष वो है जिसके आगे सिर स्वत:झुक जाता है।आज तो स्वार्थ के लिये हर कोई हर किसी के आगे झुकने को तैयार है। पर नमस्कार की सार्थकता तो महापुरूष के ही चरणों में झुकने में हैं।कोई महापुरूष बनता कैसे है?जीवन में महत्ता आती कैसे है?ये विचारणीय है ताकि उसे जानकर प्रेरणा ली जा सके। उक्त बातें अहोबिल रामानुज जीयर स्वामीजी प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमान बाग मंदिर में चल रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा में कही।उन्होंने कहा कि क्षुद्र-स्वार्थ और व्यक्तिगत सुख के लिये जीने वाले कभी महापुरूष नहीं बन सकते।उसके लिये समस्त सुख-सुविधाओं का त्याग करके घर से बाहर निकलना पड़ता है।कुश-कंटकों पर चलते हुये सर्दी, गर्मी और बरसात को सहते हुये महान् लक्ष्य की ओर अग्रसारित होते रहना पड़ता है।घर में पलंग पर लेटकर ख़्वाब गढ़ने वाले कोई बड़ी क्रान्ति नहीं करते जब तक संघर्ष की आग में तपने के लिये बाहर न निकलें। जीयर स्वामी जी ने कहा कि श्रीराम महापुरूष इसीलिये कहे गये क्योंकि समस्त अवतारों में सर्वाधिक दुख उन्होनें ही उठाये हैं।दूसरे की पीड़ा के दंश को वही समझ सकता है जो दुख की आग में स्वयं झुलसा हो।और इसका परिणाम यह हुआ कि श्रीराम सर्वाधिक सुख देने वाले भी हुये।श्रीराम के जीवन की दो बातें जो विशेष उल्लेखनीय है और हमारे लिये सबसे अधिक प्रेरक है।पहली बात तो यह कि बड़ी से बड़ी विपत्ति से वो घबराये नहीं,कभी हिम्मत नहीं हारे।ईश्वर होते हुये भी एक मनुष्य की नियति की समस्त बिडम्बनाओं का मुक़ाबला मनुष्योचित तरीक़े से अपने पौरूष-पराक्रम और बल-विक्रम से करके दिखाये।उन्होनें कभी ऊँचाई पर रहने देवताओं से कभी कोई सहायता नहीं माँगी।दूसरी बात यह कि उन्होनें ने कभी किसी को छोटा और बड़ा नहीं समझा।अपने आदर्शों की पूर्ति के लिये सबको अपनाया।अपने प्रेममय विनीत आचरण से वन में रहनेवालों को अपना बनाकर इतना निर्भय बना दिया कि वे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध खड़े हो गये।श्रीराम अकेले रावण को मारते तो लोगों के हृदय में बैठा भय रूपी रावण कभी न मरता, उन्होनें लोगों में इतना विश्वास जगाया कि पशु पक्षी तक रावण से युद्ध के लिये तैयार हो गये।फलत: समाज से बुराई का अन्त हुआ, लोग मानवता के सहयोग के लिये सतत तैयार रहने लगे। बाल्मीकि रामायण कथा महोत्सव की अध्यक्षता करते हुए श्रीमहंत जगदीश दास जी महाराज ने कहा कि श्रीराम लला के सुमिरन से हम सभी का भाग्य बदल रहा है।आज व्यक्ति दूसरों के सुख से दुखी हैं अपने कर्म से दुखी नही होते हैं। हम स्वयं जब बुरे बन जायेंगे तो दूसरों में बुराई देखेंगे इस लिए अच्छा सोचो और अच्छा देखो अपने जीवन को स्वच्छ और पवित्र बनाओ। श्रीमहंत जी ने नवधाभक्ति पर विस्तार पूर्वक चर्चा करते हुये कहा कि भगवान, भक्त और भक्ति की श्रेष्ठता का वर्णन किया गया।उन्होंने कहा कि प्रशंसा व्यक्ति के लिये हानिकारक और आलोचना आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करती है। इस निंदा करने वालों से विचलित मत हों सद्कर्मों को करते हुये प्रगति करते रहिए। इस दिव्य महोत्सव का समापन सोमवार को होगा। कथा से पूर्व मंदिर में 120 वैदिक आचार्य वाल्मीकि रामायण का पारायण पाठ सामूहिक रुप से किया।इसके बाद विश्व कल्याण व राष्ट्र उत्थान हेतु यज्ञ कुंड में आहुतियां डाली गई। इस भव्य कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दक्षिण भारत से सौकड़ों रामभक्त आये है। सौमित्र स्वामीजी व यज्ञाचार्य गिरीधराचार्य स्वामीजी कार्यक्रम की देखरेख कर रहें। व्यवस्था में हरि स्वामी के साथ हनुमान बाग मंदिर के सुनील दास,पुजारी योगेंद्र दास, रोहित शास्त्री व नितेश शास्त्री लगे हुए है।

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