हमारी श्वांस-प्रश्वांस आराध्य के साथ धड़कती है: महंत रामशरण दास : रंग महल में झूले पर विराजे अवधविहारी-विहारिणी को पुष्पों एवं पुष्पलड़ियों से इस कदर आच्छादित किया गया कि फूल-बंगला बन गया
admin
Tue, Aug 11, 2026
हमारी श्वांस-प्रश्वांस आराध्य के साथ धड़कती है: महंत रामशरण दास
रंग महल में झूले पर विराजे अवधविहारी-विहारिणी को पुष्पों एवं पुष्पलड़ियों से इस कदर आच्छादित किया गया कि फूल-बंगला बन गया
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या में मधुर उपासना परंपरा की शीर्ष पीठ श्रीरंगमहल में बीती शाम झूलनोत्सव का चरम परिभाषित हुआ। झूले पर विराजे अवधविहारी-विहारिणी को पुष्पों एवं पुष्पलड़ियों से इस कदर आच्छादित किया गया कि फूल-बंगला बन गया। भक्ति में पगे संतों के बीच फूल-बंगला में आराध्य को सजाने की परंपरा पुरानी है और रंगमहल में इस परंपरा पर अमल के साथ आराध्य के सम्मुख संगीत की महफिल सजाई गई। इस दौरान मंदिर के संस्थापक एवं रसिक संत पूज्य सरयूशरण महाराज सहित कुछ अन्य दिग्गज आचार्यों के पदों की प्रस्तुति से भक्ति, अध्यात्म एवं संस्कृति की प्रवाहित त्रिवेणी आकर्षण के केंद्र में रही और इस सलिला में डुबकी लगाने वालों में मलूक पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र देवाचार्य, जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य, महंत डा रामानंद दास, जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेशप्रपनाचार्य, महंत राम-लखन दास, महंत डा महेश दास, बावन जी मंदिर के वैदेही बल्लभ शरण, महंत रामकुमार दास, महंत सीताराम दास आदि सहित रामनगरी के संत शामिल रहे। उत्सव की अध्यक्षता रंगमहल के महंत रामशरणदास ने किया। उन्होंने संतों का स्वागत करने के साथ आभारपूर्वक विदाई दी। रात्रि आठ बजे से शुरू संगीत संध्या मध्यरात्रि शयन आरती के साथ समाप्त हुई। यहां सावन की पूर्व संध्या से ही शुरू होता है झूलनोत्सव रंगमहल में सावन माह की शुरुआत होते ही गुरु पूर्णिमा से ही आराध्य का झूला तन गया है। आराध्य के सम्मुख समर्पण के गीतों की महफिल भी सज रही है। मधुर उपासना का पर्याय झूलन महोत्सव रामनगरी के आम मंदिरों में सावन शुक्ल तृतीया से शुरू होता है, पर रंगमहल व सद्गुरु सदन में यह उत्सव प्रति वर्ष की तरह 19 दिन पूर्व ही शुरू हो गया और पूरे माह चलेगा। इसके पीछे भगवान राम के प्रति अनन्य अनुराग की परंपरा है। रंगमहल में इस विशिष्ट विरासत के सूत्रधार सिद्ध संत परमपूज्य स्वामी सरयूशरण थे। वे उस श्रेणी के साधक थे, जिनके लिए आराध्य विग्रह मृण्मय मूर्तियां न होकर चिन्मय-चैतन्य विग्रह थे और वे आराध्य को सतत सहचर के रूप में अनुभूत करते थे। सरयूशरण की यह भाव-भावना उस रंगमहल के रूप में मूर्तिमंत हुई, जिसे उन्होंने तीन सौ वर्ष पूर्व प्रतिष्ठित किया। यह विरासत आज भी पूरी शिद्दत से प्रवाहमान है। आराध्य के साथ धड़कती है श्वास-प्रश्वास संस्थापक आचार्य के अनुरूप रंगमहल की आध्यात्मिक परंपरा आगे बढ़ा रहे महंत रामशरणदास कहते हैं, हमारी श्वांस-प्रश्वांस आराध्य के साथ धड़कती है और हम यह महसूस करते हैं कि वे पूरी चैतन्यता से हमारे साथ हैं। इस भाव की तस्दीक प्रत्येक वर्ष सावन शुक्ल एकादशी के मौके पर यहां सजने वाली गलबहियां की झांकी है। मान्यता है कि सावन के आह्लाद से भरकर भगवान राम और भगवती सीता के विग्रह एक-दूसरे के कंधे में बांह डाल कर सावन की मनोहारी भावधारा में डुबकी लगाते हैं। इस मौके पर आये हुए अतिथियों का स्वागत मंदिर से जुडे पुजारी राहुल जी व पुजारी साकेत जी व छोटू भैया ने किया।
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