रामलला सदन देवस्थानम में पवित्रोत्सव का शुभारंभ : वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीराम-सीता, लक्ष्मण व हनुमानजी का पंचामृत से अभिषेक; दक्षिण भारतीय वाद्य और मशालों ने मोहा मन
admin
Fri, Aug 21, 2026
रामलला सदन देवस्थानम में पवित्रोत्सव का शुभारंभ
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीराम-सीता, लक्ष्मण व हनुमानजी का पंचामृत से अभिषेक; दक्षिण भारतीय वाद्य और मशालों ने मोहा मन
अयोध्या। रामनगरी के रामकोट स्थित प्रसिद्ध पीठ श्री रामलला सदन देवस्थानम में गुरुवार को पवित्रोत्सव का विधिवत शुभारंभ हुआ। देवस्थानम पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ. स्वामी राघवाचार्य महाराज के सानिध्य एवं अध्यक्षता में आयोजित अनुष्ठान में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान तिरुपति के साथ श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमानजी का पंचामृत समेत विभिन्न दिव्य द्रव्यों से अभिषेक किया गया। हवन-पूजन के उपरांत भगवान को विशेष दिव्य माला धारण कराई गई। दक्षिण भारतीय वाद्ययंत्रों की मंगल ध्वनि और मशालों की भव्य प्रस्तुति ने आयोजन को और आकर्षक बना दिया।
जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ. स्वामी राघवाचार्य महाराज ने बताया कि श्रीवैष्णव संप्रदाय में पवित्रोत्सव भगवान की आराधना से जुड़ा विशेष वार्षिक उत्सव है। आगमिक परंपरा के अनुसार वर्षभर होने वाली नित्य और नैमित्तिक पूजा के दौरान अनजाने में रह गई मंत्र, तंत्र, क्रिया, समय अथवा उपचार संबंधी न्यूनताओं के प्रायश्चित्त और दोष निवारण के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है। उन्होंने कहा कि पवित्रोत्सव केवल शुद्धि का पर्व नहीं, बल्कि भगवान की आराधना को पूर्णता प्रदान करने वाला विशेष धार्मिक अनुष्ठान है।
उन्होंने बताया कि 'पवित्रोत्सव' दो शब्दों—'पवित्र' और 'उत्सव'—से मिलकर बना है। श्रीवैष्णव परंपरा में पवित्र का अर्थ केवल शुद्धता नहीं, बल्कि भगवान को अर्पित किए जाने वाले विशेष पवित्र-सूत्र से भी है। उत्सव के दौरान इन पवित्र-सूत्रों को भगवान के विग्रह, उत्सव विग्रह, परिवार देवताओं और निर्धारित अन्य स्थानों पर विधिपूर्वक धारण कराया जाता है।
अंकुरार्पण से शुरू होती है उत्सव की विधि
पवित्रोत्सव की विधि मंदिर की आगमिक परंपरा के अनुसार विभिन्न चरणों में संपन्न होती है। उत्सव की शुरुआत अंकुरार्पण से होती है, जिसमें विधि-विधान से धान्य के बीज बोए जाते हैं। इनसे निकलने वाले अंकुर मंगल, समृद्धि और उत्सव की सफलता के प्रतीक माने जाते हैं।
इसके बाद यज्ञशाला में कलश स्थापना की जाती है। वैदिक एवं आगमिक मंत्रों के साथ कलशों का संस्कार कर विभिन्न देव शक्तियों का आवाहन किया जाता है। आचार्य और अर्चक विधि-विधान से पूजा-अर्चना, होम और मंत्र-जप करते हुए यज्ञ में आहुतियां अर्पित करते हैं।
दिव्य द्रव्यों से अभिषेक और पवित्रारोपण
पवित्रोत्सव के विभिन्न चरणों में भगवान के उत्सव विग्रह का अभिषेक किया जाता है। परंपरा के अनुसार जल, दूध, दही, घी, शहद, चंदन समेत विभिन्न दिव्य द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इसके माध्यम से आराधना में रह गई न्यूनताओं के परिहार और भगवान की प्रसन्नता की कामना की जाती है।
उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान पवित्रारोपण माना जाता है। इसमें विशेष रूप से तैयार किए गए पवित्र-सूत्र भगवान को समर्पित किए जाते हैं। इसके बाद विधिपूर्वक भगवान के विग्रह और उत्सव विग्रह को पवित्र-सूत्रों से सजाया जाता है। यह अनुष्ठान भगवान की आराधना की पूर्णता और पूजा के दौरान रह गई न्यूनताओं के प्रायश्चित्त का प्रतीक माना जाता है।
आयोजन में दक्षिण भारत से आए दर्जनों वैदिक आचार्यों के साथ राजेश मिश्रा गुड्डू, रमेश मिश्रा सिब्बू, राघवेंद्र मिश्रा अप्पू, मनोज जी, स्वामी जी की शिष्या प्रिया गुप्ता, अवधेश जी सहित बड़ी संख्या में शिष्य परिकर एवं भक्तगण मौजूद रहे।
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