: अयोध्या तीर्थ पर सात भव्य जैनेश्वरी आर्यिका दीक्षा सम्पन्न
Tue, Jul 23, 2024
संयम के पथ पर चलीं सात ब्रह्मचारिणी बहनें
अयोध्या। भगवान ऋषभदेव दिगम्बर जैन मंदिर, बड़ी मूर्ति, रायगंज अयोध्या में प्रातः काल श्रीजी के अभिषेक से प्रारंभ हुआ दिवस। सात ब्रह्मचारिणी बहनों ने संयम के पथ को अंगीकार किया, जिसमें सर्वप्रथम विशाल पाण्डाल में ब्रह्मचारिणी बहनों ने गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी को आर्यिका दीक्षा के लिए श्रीफल समर्पित किया। माताजी ने सभी के मस्तक पर केशलोंच प्रारंभ करने की विधि सम्पन्न की, जिसके अन्तर्गत अपने हाथों से अपने लम्बे-लम्बे केशों को उखाड़ना होता है। पाँच बहनों ने आर्यिका दीक्षा के व्रत अंगीकार किये एवं 2 महिलाओं ने क्षुल्लिका दीक्षा के व्रत ग्रहण किए। केशलोंच सम्पन्न होने के पश्चात् पूज्य गुरुमाँ ने सभी के मस्तक पर हाथ रखकर संस्कार आरोपित किए, व्रत ग्रहण करवाए एवं सभी ब्रह्मचारिणी बहनों को दीक्षा के पश्चात् नवीन नाम प्रदान किए एवं इन दीक्षार्थियों के माता-पिता बनाने का जैन आगम में विधान आया है, उस क्रम में शोभा पहाड़े के माता-पिता बनने का सौभाग्य सौ. पद्मा विकास पहाडे प्राप्त किया। दीक्षार्थियों को दीक्ष के पूर्व मंगल स्नान कराया गया। दीक्षा से पूर्व सभी ब्रह्मचारिणी बहनों ने मंच पर पंचामृत अभिषेक सम्पन्न किया एवं पूज्य माताजी से जैनेश्वरी दीक्षा के लिए अनुरोध किया कि मुझे संसार सागर से पार करने वाली जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान करें व सभी परिवारजनों व समाज से क्षमायाचन की। विजय कुमार जैन मंत्री अयोध्या तीर्थ कमेटी ने बताया कि सर्वप्रथम दीक्षा के पश्चात् नवीन नाम प्रदान किये गये। शोभा पहाड़े को आर्यिका आर्षमती माताजी, ब्र. कु. इन्दु दीदी को आर्यिका हर्षमती माताजी, ब्र. कु. अलका दीदी को आर्यिका विनम्रमती माताजी, ब्र. कु. श्रेया दीदी को आर्यिका अनंतमती माताजी, ब्र. मधुबाला जी को आर्यिका विनीतमती माताजी, ब्र. राजबाला जी को क्षुल्लिका भव्यमती माताजी, ब्र. रेखा जी को क्षुल्लिका वैराग्यमती माताजी नाम प्रदान किये गये। सभी दीक्षार्थियों के मस्तक पर पूज्य गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी एवं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती माताजी ने संस्कार प्रदान किए एवं आर्यिका दीक्षा के व्रत ग्रहण करवाए व दीक्षा के नियमों से उनको अवगत कराया। समस्त चर्या का विधान बताया एवं पिच्छी-कमण्डलु, वस्त्र,शास्त्र और माला नवीन दीक्षार्थियों को प्रदान किया गया, जिसे आये हुए भक्तगणों के द्वारा प्रदान किया गया। समस्त कार्यक्रम पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी के निर्देशन में सम्पन्न किये गये। समस्त विधि-विधान प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन, पं. सतेन्द्र जैन, पं. अकलंक जैन के द्वारा सम्पन्न कराये गये। मंच संचालन डॉ. जीवन प्रकाश जैन के द्वारा किया गया। सायंकाल में भगवन्तों की मंगल आरती एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न किया गया।सभी कार्यक्रम में मुख्यरूप से कैलाश चन्द्र जैन सर्राफ,अमरचंद जैन सर्राफ, ऋषभ जैन,अशोक चांदवड़,अशोक दोशी, कमल कासलीवाल, रोशन केलावत, अनिल जैन, सभाषचंद जैन, विजय जैन, बिजेन्ट जैन, संजय जैन,सीवान राजन जैन, पंकज जैन आदि मौजूद रहें।
: हनुमान बाग में शिष्य परिकरों ने निवेदित की अपनी श्रद्धा
Tue, Jul 23, 2024
प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमान बाग मंदिर में धूमधाम से मनाया गया गुरुपूर्णिमा महोत्सव, शिष्यों को दिया गया दीक्षा
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या में गुरु पूर्णिमा के मौके पर लाखों की संख्या में अयोध्या पहुंचे श्रद्धालुओं ने सरयू में स्नान के बाद राम जन्मभूमि हनुमानगढ़ी सहित प्रमुख मंदिरों में पूजन अर्चन किया इसके बाद सभी भक्त अपने गुरुओं की आराधना की। गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म की प्राचीन परंपरा है जिस का निर्वाह आज भी लोग अपने गुरुओं के दर्शन पूजन और सेवा कर करते हैं। रामनगरी के प्रसिद्ध पीठों में शुमार श्री हनुमान बाग मंदिर में महंत जगदीश दास महाराज के पावन सानिध्य में बड़े ही धूमधाम के साथ गुरु पूर्णिमा महोत्सव बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया गया। मंदिर में गुरु पूर्णिमा पर शिष्यों का जमावड़ा रहा। महोत्सव से दूर दराज से हजारों भक्तों ने अपनी हाजिरी लगाई। महंत जगदीश दास जी महाराज ने कहा कि आज गुरु पूर्णिमा के मौके पर व्यास की पूजा और व्यास की तिथि है आज शिष्य अपने गुरु की पूजा करते हैं और गुरु से आशीर्वाद लेते हैं। महंत जगदीश दास जी ने कहा कि जब मंत्र की सृष्टि गुरु शिष्य के हृदय में स्थापित करता है तब उसका स्वरूप ब्रह्मा का होता है पालन पोषण और विस्तार को लेकर जब ज्ञान देता तो गुरु का स्वरूप विष्णु का होता है और जब गुरु सभी शक्ति शिष्य को प्राप्त कराने के लिए इज्जत करता है तो सिर्फ उसका शुरू पारब्रह्म परमेश्वर का हो जाता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यता है कि गुरु की बात मानने वाले शिष्य को उसकी मुक्ति को संशय नहीं रहता आज के दिन गुरु पूर्णिमा है जो गुरु के लिए है लोग आश्रम में जा कर के अपने गुरुओं की पूजा करते हैं गुरु की महत्वता और कृपा आप पूर्ण रुप से शिष्य को मिली और शिष्य का कल्याण हो इसलिए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस मौके पर पुजारी योगेंद्र दास, सुनील दास,रोहित शास्त्री, नितेश शास्त्री सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।
: गुरू एक सच्चा पथ प्रदर्शक होता है : मामा दास
Mon, Jul 22, 2024
प्रसिद्ध पीठ श्री हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन श्रीमहंत प्रेमदास जी महाराज व हनुमत संस्कृत स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य महंत डा महेश दास जी का मामा दास ने किया पूजन
अयोध्या। सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा के दिन वेदों के रचयिता वेदव्यास जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। उक्त बातें अयोध्याधाम स्थित प्रतिष्ठित पीठ श्री हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन श्रीमहंत प्रेमदास जी महाराज व हनुमत संस्कृत स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य महंत डा महेश दास जी के शिष्य समाजसेवी संत मामा दास महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास को जगत का प्रथम गुरु माना जाता है। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ पूर्णिमा और व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा का यह पर्व महर्षि वेद व्यास को समर्पित है क्योंकि आज के दिन ही महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। इस दिन शिष्य अपने गुरुओं की पूजा करते हैं। गुरु पूर्णिमा मुख्यतः हमारे गुरुओं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का दिन है। ये गुरु औपचारिक आध्यात्मिक शिक्षक, वंश धारक या कोई भी व्यक्ति हो सकते हैं। जो ज्ञान और बुद्धि प्रदान करते हैं। हमारे जीवन पथ पर मार्गदर्शन करते हैं। हमें अंधकार से उजाले की ओर ले जाते हैं। गुरू एक सच्चा पथ प्रदर्शक होता है। जो हमें सच्चाई के मार्ग पर ले जाता है। वह हमेशा हमारी भलाई के बारे में सोचता है। मामा दास ने कहा कि मंदिर में गुरू पूर्णिमा हर्षोल्लास पूर्वक मनाई गई। इसमें दूर- दराज से भक्तगण सम्मिलित हुए। जिन्होंने गुरु की पूजा कर जीवन धन्य बनाया। सर्वप्रथम मंदिर में हनुमानजी का भोग लगाकर आरती-पूजन किया गया। फिर मैंने अपने अपने पूज्य गुरूदेव का पूजन-अर्चन कर आरती उतारी। तदुपरांत शिष्यगणों ने बारी-बारी से गुरूदेव का पूजन किया। पूजन-अर्चन का सिलसिला देरशाम तक चलता रहा। शिष्यगणों ने भेंट स्वरूप उपहार भी प्रदान किया।