: श्रीजानकी सदन का हुआ भव्य भूमि पूजन
Mon, Jul 8, 2024
अयोध्या आने वाले तीर्थयात्रियों को इसमें सभी सुविधाएं मिलेंगी: विंदुगाद्याचार्य
पूज्य करुणासिंघु जी महाराज के पावन स्मृति में ये भवन बनने जा रहा: रसिक पीठाधीश्वर
अयोध्या। रामनगरी के प्रसिद्ध रसिकपीठ जानकीघाट बड़ास्थान में रविवार को दशरथ महल विंदुगाद्याचार्य महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य महाराज के संयोजन में श्रीजानकी सदन का भूमिपूजन किया गया। महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य ने कहा कि जानकीघाट बड़ास्थान में बहुत ही दिव्य और सुंदर भवन बनने जा रहा है, जिसका नाम श्रीजानकी सदन है। पूज्य करुणासिंघु जी महाराज के पावन स्मृति में ये भवन बनने जा रहा है। विधि-विधान पूर्वक उसका भूमिपूजन किया गया। यह भवन तीर्थयात्रियों के लिए सर्वोपयोगी होगा। अयोध्या आने वाले तीर्थयात्रियों को इसमें सभी सुविधाएं मिलेंगी। जानकीघाट बड़ास्थान के महंत रसिकाचार्य जन्मेजय शरण ने कहा कि श्रीजानकी सदन के लिए 11 ईंट रखकर भूमिपूजन / शिलापूजन महंत देवेंद्र प्रसादाचार्य महाराज द्वारा किया गया। आश्रम प्रांगण में संतों भक्तों हेतु बहुत ही दिव्य भवन बनने जा रहा है, जिसका शुभारंभ आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया पर किया गया है। जो जल्द ही बनकर तैयार हो जायेगा। भूमिपूजन अवसर पर बड़ाभक्तमाल के महंत स्वामी अवधेश कुमार दास, महापौर महंत गिरीशपति त्रिपाठी, निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेंद्र दास, जगद्गुरू स्वामी रामदिनेशाचार्य हनुमानगढ़ी के सरपंच महंत रामकुमार दास, बड़े हनुमान के उत्तराधिकारी स्वामी छविराम दास, डाड़िया महंत गिरीश दास, तीर्थ पुरोहित धर्मार्थ सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष राजेश महाराज, खाकी अखाड़ा महंत सुशील दास, सीताराम निवास महंत भूषण दास, महंत सच्चिदानंद दास, महंत अंजनी शरण, महंत अर्जुन दास, महंत जनार्दन दास, नागा रामलखन दास, महंत रामशरण दास रामायणी, महंत हरिचरण दास शास्त्री, महंत रामकृष्ण दास रामायणी, महंत तुलसीदास, महंत कमलादास रामायणी, सूरज नागा, राघव दास, भानु बाबा, विद्याभूषण शरण, सुदामा दास, कमंडल बाबा, संतदास, महिपाल सिंह नागपुर, डॉ. रतेश, अभय जी, शिवशंकर, दिनेश पांडेय, नंदकिशोर मिश्र आदि उपस्थित रहे।
: श्रीसंतगोपाल मंडपम में श्रीरंगराघव भगवान की हुई प्राण प्रतिष्ठा
Mon, Jul 8, 2024
दाक्षिणात्य विद्वानों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार संग 81 कलशों से पंचामृत, फलों का रस और सर्व औषधियों से भगवान का किया गया अभिषेक
अयोध्या। रामनगरी के नवनिर्मित श्रीसंतगोपाल मंडपम में विधि-विधान पूर्वक श्रीरंगराघव भगवान की प्राणप्रतिष्ठा हुई। सर्वप्रथम दाक्षिणात्य विद्वानों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार संग 81 कलशों में भरे हुए पंचामृत, फलों का रस और सर्व औषधियों से भगवान का अभिषेक किया गया। उसके बाद श्रीरंगराघव का दिव्य श्रृंगार हुआ। तदुपरांत विविध पकवानों का भोग लगाकर भव्य आरती उतारी गई। प्राणप्रतिष्ठा के बाद रविवार को गोदोहन, उत्थापन, नित्य हवन-पूजन, कलशयात्रा आदि कार्यक्रम हुआ। श्रीसंतगोपाल मंडपम के पीठाधिपति श्रीमज्जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी कूरेशाचार्य ने बताया कि स्वामी संतगोपालाचार्य महाराज अयोध्या के एक महान संत रहे। जिनका सन् 2011 में परम पद हुआ। उन्हीं की स्मृति में श्रीसंतगोपाल मंडपम का निर्माण किया गया। उसी संतगोपाल मंडपम् में विधि-विधान पूर्वक श्रीरंगराघव भगवान की प्राण प्रतिष्ठा की गई। श्रीरंगनाथ भगवान सूर्यवंशी और अयोध्या के कुलदेवता हैं। प्रभु श्रीराम जब लंका से आए। तो उनके साथ विभीषण भी थे। विभीषण लंका नही जाना चाहते थे। श्रीराम ने उनसे कहा मैंने तुम्हें लंकेश बनाया है तुम्हें जाना ही पड़ेगा। विभीषण ने प्रभु से कहा ठीक है। तो कोई अपना चिन्ह ही दे दीजिये। जिसे देखकर आपका स्मरण करते रहेंगे। तब श्रीराम ने श्रीरंगनाथ भगवान को दे दिया। वह वर्तमान में श्रीरंगम त्रिचनापल्ली में विद्यमान हैं। जो श्रीरंगनाथ भगवान अयोध्या से श्रीरंगम दक्षिण भारत चले गए थे। उन श्रीरंगनाथ भगवान को पुन अयोध्या लाया गया। जो नौ फिट लंबे व सात फिट ऊंचे हैं। उनका वजन सौ किलो का है, जिसमें प्रभु श्रीसीताराम रंगनाथ भगवान की गोद में विराजमान हैं। ऊपर छत्र लिए भरतलाल, दाहिने लक्ष्मण व बायीं ओर शत्रुघ्न चंवर लिए हुए हैं। शेष शैय्या पर भगवान शेष जी लेटे हैं। चरणों में दाहिने हनुमान और बायीं ओर गरूड़ विराजमान हैं। ठीक नीचे रामानुज स्वामी विद्यमान हैं। श्रीरंगनाथ भगवान के विग्रह का प्राणप्रतिष्ठा दाक्षिणात्य विद्वानों द्वारा किया गया। प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव को कांची प्रतिवादि भयंकर मठ के स्वामी श्रीनिवासाचार्य महाराज व उनके युवराज बालक स्वामी ने सानिध्यता प्रदान किया। इस मौके पर जगदुरु स्वामी वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर, जगद्गुरू स्वामी राघवाचार्य, मुख्य यजमान आईपी सिंह, कामरेड सूर्यकांत पाण्डेय समेत अन्य उपस्थित रहे।
: रामराज्य का अर्थ प्रेम राज्य है और प्रेम हमें समर्पण सिखाता है: जगद्गुरू
Sun, Jul 7, 2024
हरिधाम गोपाल मंदिर में राम कथा के सप्तम-दिवस जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ने भरत चरित्र का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया
अयोध्या। सच्चा धर्म हमें प्रेम सिखाता है।प्रेम की व्याख्या हमें भरत चरित्र में दिखाई देता है।प्रेम हमें स्वार्थहीन होने सिखाता है।नि:स्वार्थता की अग्नि में तपकर ही प्रेम अपने उज्जवल रूप में अभिव्यक्त होता है।सर्वथा स्वार्थ शून्य व्यक्ति ही संसार में परिवर्तन ला सकता है।भरत जी अवध का सिंहासन ग्रहण करे ,धर्म उसका समर्थन कर रहा था।पर भरत के अन्त: करण ने इसका समर्थन नहीं किया। उक्त बातें जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी ने हरिधाम गोपाल पीठ मंदिर में आयोजित राम कथा के सप्तम-दिवस में कही।उन्होंने कहा कि भरत ने धर्म के स्थान पर परमधर्म को स्वीकार किया।भरत का परम धर्म है-सेवा धर्म।जिस रामराज्य को महाराज दशरथ अयोध्या में लाना चाह रहे थे उसके शिल्पकार श्रीभरत बने।क्योंकि रामराज्य की आधारशिला प्रेम है।श्रीभरत के रामप्रेम ने कैकेयी की कठोरता को भी पिघला रख दिया।रामराज्य का अर्थ प्रेम राज्य है और प्रेम हमें समर्पण सिखाता है। जगद्गुरु जी ने कहा कि जहाँ पर केवल देना ही देना है लेना कुछ नहीं है उसी को रामराज्य कहते है।श्रीराम और भरत दोनों की मान्यतायें एक है। जीवन में त्याग श्रेष्ठ है।जहाँ त्याग होगा वहाँ संघर्ष का स्थान ही नहीं रहेगा।उन्होंने कहा कि आजकल भारत देश का हर नेता रामराज्य लाने की बात करते दिखाई देते हैं।किन्तु ध्यान रहे रामराज्य न तो कहीं से लाना पड़ता है न बनाना पड़ता है हमें स्वयं पहले रामराज्य के योग्य नागरिक बनना पड़ता है।जिस दिन भरत की तरह प्रेम और त्याग हमारे जीवन में आ जायेगा हम सम्पत्ति को अपनी नहीं प्रभु की मान लेगें उसी दिन रामराज्य की अवधारणा सत्य हो जायेगी। कथा में भक्तों का भारी हुजूम रहा। महोत्सव का संचालन आचार्य रमेश शास्त्री व देखरेख गौरव दास ने किया। रामकथा में बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहें।