: क्षुद्र-स्वार्थ और व्यक्तिगत सुख वाले कभी महापुरूष नहीं बन सकते: रामानुजाचार्य
Tue, Feb 28, 2023
जानकीमहल ट्रस्ट में चल रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा का हुआ समापन
अयोध्या। वाल्मीकि राम को महापुरुष कहकर नमन करते हैं।सच कहूँ तो महापुरूष ही नमन के योग्य है।महापुरूष वो है जिसके आगे सिर स्वत:झुक जाता है।आज तो स्वार्थ के लिये हर कोई हर किसी के आगे झुकने को तैयार है। पर नमस्कार की सार्थकता तो महापुरूष के ही चरणों में झुकने में हैं।कोई महापुरूष बनता कैसे है?जीवन में महत्ता आती कैसे है?ये विचारणीय है ताकि उसे जानकर प्रेरणा ली जा सके। उक्त बातें जगद्गुरू रामानुजाचार्य रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी जानकीमहल ट्रस्ट में चल रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के समापन सत्र में कही।उन्होंने कहा कि क्षुद्र-स्वार्थ और व्यक्तिगत सुख के लिये जीने वाले कभी महापुरूष नहीं बन सकते।उसके लिये समस्त सुख-सुविधाओं का त्याग करके घर से बाहर निकलना पड़ता है।कुश-कंटकों पर चलते हुये सर्दी, गर्मी और बरसात को सहते हुये महान् लक्ष्य की ओर अग्रसारित होते रहना पड़ता है।घर में पलंग पर लेटकर ख़्वाब गढ़ने वाले कोई बड़ी क्रान्ति नहीं करते जब तक संघर्ष की आग में तपने के लिये बाहर न निकलें। रामानुजाचार्य जी ने कहा कि श्रीराम महापुरूष इसीलिये कहे गये क्योंकि समस्त अवतारों में सर्वाधिक दुख उन्होनें ही उठाये हैं।दूसरे की पीड़ा के दंश को वही समझ सकता है जो दुख की आग में स्वयं झुलसा हो।और इसका परिणाम यह हुआ कि श्रीराम सर्वाधिक सुख देने वाले भी हुये।श्रीराम के जीवन की दो बातें जो विशेष उल्लेखनीय है और हमारे लिये सबसे अधिक प्रेरक है।पहली बात तो यह कि बड़ी से बड़ी विपत्ति से वो घबराये नहीं,कभी हिम्मत नहीं हारे।ईश्वर होते हुये भी एक मनुष्य की नियति की समस्त बिडम्बनाओं का मुक़ाबला मनुष्योचित तरीक़े से अपने पौरूष-पराक्रम और बल-विक्रम से करके दिखाये।उन्होनें कभी ऊँचाई पर रहने देवताओं से कभी कोई सहायता नहीं माँगी।दूसरी बात यह कि उन्होनें ने कभी किसी को छोटा और बड़ा नहीं समझा।अपने आदर्शों की पूर्ति के लिये सबको अपनाया।अपने प्रेममय विनीत आचरण से वन में रहनेवालों को अपना बनाकर इतना निर्भय बना दिया कि वे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध खड़े हो गये।श्रीराम अकेले रावण को मारते तो लोगों के हृदय में बैठा भय रूपी रावण कभी न मरता, उन्होनें लोगों में इतना विश्वास जगाया कि पशु पक्षी तक रावण से युद्ध के लिये तैयार हो गये।फलत: समाज से बुराई का अन्त हुआ, लोग मानवता के सहयोग के लिये सतत तैयार रहने लगे।
: राष्ट्रीय फलक पर शिरोधार्य हुए थे पूज्य किलाधीश जी महाराज
Mon, Feb 27, 2023
25 पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर स्मृति पर्व में आचार्य स्वामी श्री सीताराम शरण जी महाराज लक्ष्मणकिलाधीश जी की पुस्तक का हुआ विमोचन
गीता तात्पर्य, श्री वैषणव दर्शन, श्री सीतातत्व मीमांसा का किलाधीश महंत मैथली रमण शरण की अध्यक्षता में हुआ विमोचन
अयोध्या। संतो की सराय कही जाने वाली रामनगरी में अनेक भंजनानंदी संत हुए हैं। उन्हीं संतो में एक थे रसिकोपासना के आचार्य परमपूज्य स्वामी सीताराम शरण जी महाराज। जिनकी 25वीं पुण्यतिथि बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ आचार्य पीठ श्रीलक्ष्मण किला में मनाया जा रहा है। पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर स्मृतिपर्व के रुप में पूज्य किलाधीश जी की रचनाओं से सराबोर पुस्तक का भव्य विमोचन किया गया।
रसोपासना के आचार्य स्वामी सीताराम शरण जी महाराज ग्राम्यांचल की भक्ति धारा से लेकर विश्वविद्यालयीय विचार और आलोचना तक आपकी वाणी ने अपना जादू बिखेरा। एक प्रसंग के अनुसार दक्षिण के वयोवृद्ध विद्वान ने अयोध्या की पहचान की कहा कि स्वामी सीताराम शरण जी वाली अयोध्या स्वाध्याय प्रवचन की वाचिक परम्परा के साथ ही टीका व्याख्या और पद रचना के साथ ही पूर्वाचार्यों के साहित्य का सम्पादन-प्रकाशन भी स्वामी सीताराम शरण जी महाराज का उल्लेखनीय अवदान रहा। चार दशक तक पीठ का सक्रिय आचार्यत्व निभाकर सन 1997 के वसन्त ऋतु में आचार्य श्री का साकेतवास हो गया।
आचार्य श्री की पुण्यतिथि समारोह मंगलवार को मनाया जाएगा किलाधीश जी का वैभव पूरे फलक पर रहेगा।
कार्यक्रम में जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य,हनुमत निवास के महंत अवधकिशोर शरण, मंगलभवन पीठाधीश्वर महंत कृपालु रामभूषण दास, महंत अर्जुन दास, डा सुनीता शास्त्री, भागवताचार्य तुलसीदास, महंत गिरीश पति त्रिपाठी, डा जनार्दन उपाध्याय, कैसरगंज सांसद बृजभूषण शरण सिंह सहित तमाम विशिष्ट विद्धानों ने अपने अपने विचार रखें।
पुस्तक विमोचन कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आचार्य पीठ श्री लक्ष्मणकिला के महंत मैथली रमण शरण जी कहते है पूज्य गुरुदेव द्धारा रचित ग्रन्थ नाम, महिमा, धाम, महिमा हमारी अमूल्य धरोहर है। जिसका स्वाध्याय निरंतर करते रहते है। पुण्यतिथि के अवसर पर नाम,रुप,लीला व धाम सहित तमाम ग्रन्थों का सस्वर पारायण पाठ किया जा गया। मंगलवार पूज्य गुरुदेव का स्मरण पूरे फलक पर रहेगा।
महंत मैथली रमण शरण ने कहा कि तप, स्वाध्याय और शरणागति की विलक्षण स्थितियों का अनुभव करने वाले पूर्वाचार्यों ने शास्त्रों का मथितार्थ कृपापूर्वक सुलभ कराया है। अपने आश्रितवात्सल्य का मान रखते हुये श्रीकिशोरी जू सबको स्वीकार करके प्रभु के सम्मुख कर देती हैं। वेदोपनिषदादि में व्याप्त श्रीजी के लोकोत्तर वैभव का इस पुस्तक में पूज्यचरण गुरुदेव ने सुन्दर निदर्शन कराया है। मधुरोपासक श्रीवैष्णवों के लिये यह नित्य अनुसन्धेय सामग्री है। रसिक जन इसका आस्वादन करके आनन्दित होंगे ऐसा विश्वास है।
स्मृति पर्व कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए पुस्तक के सम्पादक प्रख्यात साहित्यिक महंत मिथलेश नन्दनी शरण हनुमत निवास कहते है कि पूज्य किलाधीश महाराज का गायन अद्वितीय रहा उनकी कथा
विश्वविद्यालयों से लेकर खेती किसानी करने वालों के लिए रही जो अपने आप में अद्भुत है।
श्रीसम्प्रदाय अपने नाम के अनुरूप ही श्रीतत्त्व को उपास्य और अनुसन्धेय मानता है। कुछ दार्शनिक भेदों और वैचारिक आयामों में श्रीतत्त्व को जीवतत्त्व का प्रतिनिधि भी माना गया है। किन्तु, श्रीरामानन्दीय उपासना पद्धति श्रीजी को परात्पर ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित करती है। श्रीरामानन्दीय रसिकोपासना के आचार्यपीठ का गौरव बढ़ाने वाले श्रीलक्ष्मणकिलाधीश पूज्य आचार्य स्वामी सीतारामशरणजी महाराज ने सीतातत्त्व मीमांसा का प्रणयन करते हुए श्रीविदेहराजकिशोरी, श्रीरामवल्लभा भगवती श्रीजानकीजी की परता का विलक्षण निदर्शन कराया है। आये हुए अतिथियों का स्वागत मंदिर के युवा संत सूर्य प्रकाश शरण व महंत छोटू शरण ने किया।
इस मौके पर बड़ी संख्या में डा परेश पाण्डेय, महंत लड्डू दास, रामानन्द दास, डा बाकेमणि त्रिपाठी, अनुज दास, कैसरगंज सांसद बृजभूषण शरण सिंह के अयोध्या प्रभारी महेंद्र त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में किला से जुड़े संत साधक मौजूद रहें।
: धर्म हमें स्वार्थ नहीं त्याग सिखाता है :रत्नेशप्रपन्नाचार्य
Mon, Feb 27, 2023
जगद्गुरू जी ने कहा, पत्नी का अधिकार यदि पति के सुख में है तो दुख में भी होना चाहिये, हमें आगे बढ़कर एक दूसरे की विपत्ति का सहायक बनना चाहिये
अयोध्या। रामराज्य की भूमिका त्याग और साधना से शुरू होती है।श्रीराम साधक बनकर तपस्वी बनकर वन को गये ।जीवन में जबतक हम तप को ,श्रम को ,त्याग को नहीं अपनायेंगे तब श्रेष्ठ जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। उक्त उद्गार प्रख्यात कथावाचक जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने जानकी महल ट्रस्ट में आयोजित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अष्टम दिवस में कही। जगद्गुरू जी ने कहा कि श्रीराम के साथ माता सीता भी वन को गयी।माता सीता ने कहा पत्नी का अधिकार यदि पति के सुख में है तो दुख में भी होना चाहिये।हमें आगे बढ़कर एक दूसरे की विपत्ति का सहायक बनना चाहिये।समान सुखदुखयो।हम हर किसी सुख में हिस्सेदारी तो चाहते हैं पर दुख में साथ छोड़ देते है।हमें अपने देश की विपत्ति में देश के साथ खड़ा होना चाहिये रामायण की कथा हमें ये शिक्षा देती है।धर्म हमें स्वार्थ नहीं त्याग सिखाता है।भगवान श्रीराम के अवतरण के पूर्व भी राज्य तंत्र था और राजा प्रजापालन भी करते थे, किंतु वे प्रजा की उनके किसी कार्य की क्या प्रतिक्रिया होगी, इसका कदाचित ही चिंतन करते थे। भगवान श्रीराम ने प्रजा की इच्छानुकूल राज्य व्यवस्था की थी। उन्होंने कहा कि वनगमन के समय जब अनुज लक्ष्मणजी साथ चलने का आग्रह करने लगे, तब प्रजातंत्र का अनन्यतम सूत्र प्रकट करते हुए प्रभु श्रीराम कहते हैं - 'हे भाई ! तुम यहीं अयोध्या में रहो और सबका परितोष करो, अन्यथा बहुत दोष लगेगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है। ऐसी नृप नीति होने के कारण ही उनके राज्य में सभी सुखी रहते थे। कथा से पूर्व आयोजक कुसुम सिंह व डॉ० दिनेश कुमार सिंह ने व्यास पीठ का पूजन किया।