दंतधावन कुंड में सजी क्षीरशायी भगवान विष्णु की अलौकिक झांकी, : 137 वर्षों से चली आ रही परंपरा का शरद पूर्णिमा पर हुआ भव्य आयोजन, दर्शन-पूजन के लिए उमड़े हजारों श्रद्धालु
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Sun, Oct 25, 2026
दंतधावन कुंड में सजी क्षीरशायी भगवान विष्णु की अलौकिक झांकी, 11 क्विंटल खीर का लगा भोग
137 वर्षों से चली आ रही परंपरा का शरद पूर्णिमा पर हुआ भव्य आयोजन, दर्शन-पूजन के लिए उमड़े हजारों श्रद्धालु
अयोध्या। शरद पूर्णिमा के पावन पर्व पर रामनगरी अयोध्या के दंतधावन कुंड में आस्था, भक्ति और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। साकेत भूषण समाज की ओर से 137 वर्ष पुरानी परंपरा के तहत क्षीरशायी भगवान विष्णु की अलौकिक झांकी सजाई गई। भगवान विष्णु को 11 क्विंटल खीर का भोग अर्पित किया गया। इसके बाद देर रात तक श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया। भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए अयोध्या सहित दूरदराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में महिला, पुरुष और बच्चे पहुंचे।
शरद पूर्णिमा के अवसर पर दंतधावन कुंड और वहां तक पहुंचने वाले मार्ग को विशेष इलेक्ट्रिक लाइटों से सजाया गया था। आकर्षक रोशनी के बीच सजी क्षीरशायी भगवान विष्णु की झांकी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रही। दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती रही। पूरे परिसर में धार्मिक उल्लास और भक्ति का वातावरण बना रहा।
शेषशैया पर विराजमान भगवान विष्णु के हुए दिव्य दर्शन
साकेत भूषण समाज की ओर से सजाई गई झांकी में भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विराजमान थे। उनके हाथों में शंख, चक्र और गदा सुशोभित थे। माता महालक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ विराजमान थीं। वहीं, भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा विराजमान थे। झांकी में नारद मुनि की उपस्थिति ने भी धार्मिक स्वरूप को विशेष आकर्षण प्रदान किया। कुंड में जलविहार करते भगवान के इस मनोहारी स्वरूप के दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
आयोजन समिति के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार गुप्त ने बताया कि दंतधावन कुंड में क्षीरशायी भगवान विष्णु की झांकी सजाने की परंपरा 137 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। समाज की ओर से प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा पर इस महोत्सव का आयोजन श्रद्धा और परंपरागत विधि-विधान के साथ किया जाता है। इसका उद्देश्य धार्मिक विरासत को संरक्षित रखते हुए नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ना है।
चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा की मान्यता
साकेत भूषण समाज के महामंत्री नंदलाल गुप्त ने बताया कि शास्त्रों में शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि चंद्रमा अमृत के देवता हैं और अश्विन शुक्ल पूर्णिमा की रात उनकी किरणों से अमृत की वर्षा होती है। इसी धार्मिक विश्वास के चलते भगवान विष्णु को खीर का भोग लगाया जाता है और बाद में उसे श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
महोत्सव के प्रभारी सुरेश गुप्ता ने बताया कि आयोजन में 11 क्विंटल खीर तैयार कर भगवान को अर्पित की गई। इसके बाद देर रात तक श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। झांकी का शुभारंभ भगवान की दिव्य आरती के साथ हुआ।
संतों ने उतारी भगवान की आरती
क्षीरशायी भगवान विष्णु की आरती अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं संकट मोचन सेना के अध्यक्ष महंत संजय दास महाराज, महंत राजेश दास पहलवान और शृंगी ऋषि आश्रम के पीठाधीश्वर महंत हेमंत दास महाराज ने की। साकेत भूषण समाज के संरक्षक एवं नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष राधेश्याम गुप्त ने महोत्सव में पहुंचे अतिथियों और श्रद्धालुओं का स्वागत किया।
आयोजन को सफल बनाने में अम्बिका दास, विराट दास, शिवम श्रीवास्तव, पंकज गुप्ता, विकास गुप्ता, अचल गुप्ता, कोषाध्यक्ष रामबाबू बेबस, विनोद कुमार गुप्त, प्रकाश गुप्त, चंकी गुप्त, रामजी तिवारी सहित समाज के अनेक युवाओं ने सहयोग किया। 137 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा एक बार फिर शरद पूर्णिमा पर रामनगरी की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की साक्षी बनी। भगवान विष्णु के दर्शन, खीर प्रसाद और भव्य सजावट के बीच श्रद्धालुओं ने पर्व को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया।
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