Saturday 17th of October 2026

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वक्ताओं ने कहा—प्रेम, करुणा और मानवता ही धर्म का मूल; जातिगत भेदभाव और नफरत की राजनीति पर उठाए सवाल

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‘सीइंग इक्वली’ पुस्तक का लोकार्पण, धर्म में समानता और समरसता पर मंथन : वक्ताओं ने कहा—प्रेम, करुणा और मानवता ही धर्म का मूल; जातिगत भेदभाव और नफरत की राजनीति पर उठाए सवाल

‘सीइंग इक्वली’ पुस्तक का लोकार्पण, धर्म में समानता और समरसता पर मंथन

वक्ताओं ने कहा—प्रेम, करुणा और मानवता ही धर्म का मूल; जातिगत भेदभाव और नफरत की राजनीति पर उठाए सवाल

अयोध्या। रामनगरी के करतलिया बाबा आश्रम, नया घाट में शुक्रवार को ‘सीइंग इक्वली : एन एंथोलॉजी ऑफ प्रोग्रेसिव हिंदू वॉइसेज’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। वेस्टलैंड बुक्स द्वारा प्रकाशित और प्रो. अनंतानंद रामबचन व सुनीता विश्वनाथ द्वारा संपादित इस पुस्तक पर आयोजित संवाद में धार्मिक सद्भाव, सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव और समरसता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि धर्म का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना और मानवता को मजबूत करना है, न कि उसे राजनीति और व्यापार का माध्यम बनाना।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए सुमन गुप्ता ने कहा कि सर्वधर्म समभाव की विचारधारा आज गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। उन्होंने अयोध्या के अतीत का उल्लेख करते हुए 1990 के दशक में राम की पैड़ी पर ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ गाने वालों को जेल भेजे जाने की घटना याद की। उन्होंने कहा कि ऐसे दौर में अयोध्या में इस पुस्तक का लोकार्पण और उस पर संवाद उम्मीद जगाने वाला कदम है।

धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर उठाए सवाल

पूर्व मंत्री तेजनारायण पाण्डेय पवन ने कहा कि धर्म प्रेम, करुणा और मानवता का संदेश देता है, लेकिन आज धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ और व्यापार के लिए किए जाने पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति पर निशाना साधते हुए काशी विश्वनाथ, उज्जैन महाकाल और अयोध्या के राममंदिर से जुड़े संदर्भों में धार्मिक संस्थानों की कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि ‘सीइंग इक्वली’ धार्मिक परंपरा के मानवीय और समावेशी पक्ष को सामने लाने का प्रयास है। पांडेय ने संघ से जुड़े लोगों की कथित राजनीतिक और वैचारिक विसंगतियों पर भी सवाल उठाए।

अर्धनारीश्वर के स्वरूप में समरसता का संदेश

महंत दिलीप दास महाराज ने पुस्तक के आवरण पर अंकित अर्धनारीश्वर स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान शिव का यह रूप स्त्री-पुरुष के पूरक अस्तित्व और समरसता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की परंपरा व्यापक और उदार रही है। इसकी वास्तविक शक्ति विविधता को स्वीकार करने और सभी को साथ लेकर चलने में है। धर्म को संकीर्ण दायरे में सीमित करने के बजाय उसकी उदार परंपरा को मजबूत करने की जरूरत है।

महंत बालयोगी रामदास महाराज ने साधु-संतों के बीच जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि संन्यास ग्रहण करने और पारिवारिक संबंधों से दूर होने के बाद भी संत समाज में जाति के आधार पर भेदभाव देखने को मिलता है। यह आत्ममंथन का विषय है। उन्होंने समानता और सामाजिक न्याय के लिए धार्मिक समाज को अपने भीतर मौजूद भेदभावों का सामना करने की आवश्यकता बताई।

अयोध्या की साझा संस्कृति को मजबूत करने पर जोर

स्वामी राघवेन्द्र ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में चंदा और चुनाव से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए आरएसएस की विचारधारा पर भी आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अयोध्या को धार्मिक नफरत और वैचारिक संकीर्णता से बाहर निकालने की जरूरत है। उनके मुताबिक, पुस्तक में शामिल 13 आलेख ऐसे साधु-संतों और विचारकों के विचार सामने रखते हैं, जो धर्म के मानवीय स्वरूप, समानता, धार्मिक सद्भाव और जनकल्याण की पैरवी करते हैं।

उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा के भीतर ऐसे अनेक विचार मौजूद हैं, जो जातिगत भेदभाव और नफरत के बजाय प्रेम, करुणा तथा सह-अस्तित्व को महत्व देते हैं। अयोध्या की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी साझा संस्कृति, संवाद और मानवीय संबंधों की विरासत भी इसकी विशिष्ट पहचान है। इस विरासत को मजबूत करना समय की जरूरत है।

कार्यक्रम में महंत आनंद दास, महंत रामनयन दास, महंत राममनोहर दास, महंत शत्रुघ्न दास, जटा बाबा, महंत सनत्कुमार दास, महंत कन्हैया दास, सौरभ दास नागा, अंशुल दास, कुलदीप उपाध्याय, रामबख्श यादव, प्रदीप त्रिपाठी, अखिलेश पांडेय सहित अन्य लोग मौजूद रहे। आयोजकों के अनुसार, संवाद में 100 से अधिक लोगों ने भाग लिया।

अंत में वक्ताओं ने कहा कि धर्म की सार्थकता मानव गरिमा की रक्षा, सामाजिक न्याय और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने में है। अयोध्या में ‘सीइंग इक्वली’ का लोकार्पण इसी समावेशी चेतना को आगे बढ़ाने की पहल के रूप में सामने आया।

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