राम देश की एकता के प्रतीक हैं: प्रभंजनानन्द शरण : झुनकी पीठाधीश्वर श्रीमहंत करुणानिधान शरण जी ने कहा,भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यों...
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Sat, Mar 28, 2026
राम देश की एकता के प्रतीक हैं: प्रभंजनानन्द शरण
झुनकी पीठाधीश्वर श्रीमहंत करुणानिधान शरण जी ने कहा,भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यों और संयम का नाम राम है
अयोध्या।अयोध्या धाम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास की अलौकिक छटा बिखरी हुई है। सिद्ध पीठ सियाराम किला, झुनकी घाट में आयोजित श्रीराम कथा के तृतीय दिवस पर वातावरण पूरी तरह राममय हो उठा, जब प्रख्यात कथावाचक डॉ. स्वामी प्रभंजनानंद शरण महाराज ने भगवान श्रीराम के दिव्य जन्म की कथा का भावपूर्ण और विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि त्रेतायुग में जब पृथ्वी अधर्म और अत्याचार के बोझ से व्याकुल हो उठी, तब भगवान विष्णु ने अयोध्या नगरी में राजा दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में अवतार लिया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र में, माता कौशल्या की कोख से भगवान श्रीराम का प्राकट्य हुआ। जैसे ही प्रभु ने जन्म लिया, संपूर्ण अयोध्या नगरी आनंद और उत्सव में डूब गई। देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि की और वातावरण ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
स्वामी प्रभंजनानंद शरण महाराज ने अपने प्रवचन में जीवन मूल्यों पर भी गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर गुण और अवगुण दोनों विद्यमान होते हैं, अतः संबंधों को निभाने के लिए दूसरों की कमियों को नजरअंदाज करना आवश्यक है। वाणी और विचार को उन्होंने मनुष्य की ‘स्वयं की कंपनी के उत्पाद’ बताते हुए कहा कि इनकी गुणवत्ता जितनी श्रेष्ठ होगी, व्यक्ति का मूल्य उतना ही बढ़ेगा।उन्होंने कहा कि सच्चे संबंध दिखावे और असत्य पर नहीं, बल्कि विश्वास और पारदर्शिता पर टिके होते हैं। झूठ के आधार पर बनाए गए रिश्ते क्षणिक होते हैं, जबकि सत्य पर आधारित संबंध स्थायी और मजबूत होते हैं। विश्वास को उन्होंने भवन की नींव की ईंटों के समान बताते हुए कहा कि यदि इनमें दरार आ जाए तो संपूर्ण संबंध ढह जाता है।जीवन की परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जब हालात बदलना संभव न हो, तब अपने मन की स्थिति को बदल लेना ही बुद्धिमानी है। सच्चा सुख केवल स्वयं के खुश रहने में नहीं, बल्कि दूसरों को खुश रखने में निहित है। परिवार के संदर्भ में उन्होंने कहा कि परिवार को मालिक बनकर नहीं, बल्कि माली बनकर संभालना चाहिए, जो सभी का स्नेहपूर्वक पालन करता है, परंतु किसी पर अधिकार नहीं जताता।
कार्यक्रम के समापन पर विधिवत आरती उतारी गई और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया। यह सम्पूर्ण आयोजन सियाराम किला के पीठाधीश्वर महंत करुणानिधान शरण जी महाराज के सानिध्य में संपन्न हो रहा है। इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत प्रहलाद शरण द्वारा किया गया। कथा स्थल पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही और संपूर्ण वातावरण भक्ति और आस्था से सराबोर रहा।
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