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: अरणीमंथन के द्वारा यज्ञ कुंड में अग्नि प्रज्वलित किया गया

बमबम यादव

Thu, Dec 19, 2024
अरणीमंथन के द्वारा यज्ञ कुंड में अग्नि प्रज्वलित किया गया
मोक्ष की सिद्धि के लिए यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ कर्म है: श्रीधराचार्य
अयोध्या। रामनगरी का प्रसिद्ध पीठ अशर्फी भवन मंदिर में 54 कुंडीय पंचनारायण महायज्ञ एवं श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ महोत्सव का उल्लास छाया है। महोत्सव की अध्यक्षता जगद्गुरु रामानुजाचार्यस्वामी श्रीधराचार्य जी महाराज कर रहें। महोत्सव में आज अरणीमंथन के द्वारा अग्नि प्रज्वलित करके देव अर्चन के पश्चात भगवान लक्ष्मी नारायण यज्ञशाला में पधारे। प्रभु के सानिध्य में पूज्य स्वामी जी महाराज ने हेमाद्री संकल्प लिया शरीर शुद्धि के लिए यजमान और आचार्य को पंचगव्य का प्रसन्न कराया गया, पवित्र धारण किया गया इसके पश्चात यज्ञ कुंड में ब्रह्मा विष्णु शिव का पूजन कर दिगपाल का पूजन कर अग्नि देव का षोडशोपचार से पूजन किया गया। गौ माता के गोबर से राष्ट्र रक्षा विश्व शांति पर्यावरण के शुद्ध एवं मनोकामना सिद्धि के लिए आचार्य और ब्राह्मणों के द्वारा आहुति प्रदान की गई। आज विशेष रूप से सुदर्शन भगवान की आहुतियां एवं लक्ष्मी नारायण भगवान की आहुति प्रदान की गई। श्री स्वामी श्री धराचार्य जी महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि मानव को कर्म करना चाहिए और पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात धर्म अर्थ काम मोक्ष की सिद्धि के लिए यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ कर्म है। यज्ञ स्वयं नारायण का स्वरूप है यज्ञ के जितने भी अंग है आहुति यज्ञ कुंड समिधा यज्ञ पात्र ब्राह्मण यजमान सब नारायण स्वरूप माने गए हैं। यज्ञ के द्वारा ही अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ ने प्रभु श्री राम को पुत्र के रूप में प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि पूर्व काल में जिन राजाओं के भी संतान नहीं होती थी यज्ञ पुरुष के आराधना से ही उनको संतान की प्राप्ति होती है। श्रीमद् भागवत महापुराण में विराजित 108 ब्राह्मण का यजमानों ने पूजन किया, श्री मद भागवत का सस्वर पाठ सभी आचार्यों द्वारा किया जा रहा है। श्री स्वामी जी महाराज ने श्रीमद् भागवत महापुराण का प्रवचन करते हुए भक्तों को संबोधित किया जीवन में कोई भी अपराध बन जाए तो प्रायश्चित ही सबसे श्रेष्ठ समाधान है अनजाने में महर्षि शमिक ऋषि का अपमान होने पर राजा परीक्षित ने प्रायश्चित स्वरूप अनशन व्रत लेकर के गंगा जी के तट पर संतों की शरण लिए। भारत देश धर्म प्राण संतों की भूमि है संतों की शरण में जाने पर हर एक समस्या का समाधान मिल जाता है। चक्रवर्ती सम्राट महाराज परीक्षित संत की शरण में गए और सुखदेव ऋषि ने उनके जीवन की समस्या का समाधान किया मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है भगवान की प्राप्ति भगवान की प्राप्ति। बिना महापुरुषों की चरण रज के अभिषेक के संभव नहीं इसलिए जीवन में किसी न किसी सत्पुरुष की शरण जरूर लेना, ज्ञान ही सबसे श्रेष्ठ है। ज्ञान कहीं से भी प्राप्त हो उसको ग्रहण करना चाहिए माता सबसे बड़ी गुरु कही गई है लेकिन परमात्मा कपिल देव जी से माता देव हुती ने ज्ञान प्राप्त किया सांख्य योग अष्टांग योग का उपदेश जब माता देवहूती नहीं समझ पाई तब प्रभु से उन्होंने प्रार्थना किया सहज भक्ति से भगवान की प्राप्ति कैसे हो सकती है तब प्रभु कपिल देव ने मूर्ति पूजा नख से लेकर के सिख तक प्रभु के स्वरूप का दर्शन करते हुए उनका अनुभव करने का उपदेश दिया। देश के विभिन्न प्रांतो बागलकोट आदि से पधारे भक्त जन ज्ञान गंगा में गोते लगा रहे हैं।

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