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: गुरू पूर्णिमा शिष्य का गुरू के प्रति समीक्षा का महापर्व है: राधेश्याम शास्त्री

बमबम यादव

Tue, Nov 22, 2022

अयोध्या। रामनगरी के मणिराम छावनी के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सालय में चल रहें भागवत कथा के सातवे दिन व्यासपीठ से प्रख्यात कथावाचक राधेश्याम शास्त्री जी ने दत्तात्रेय द्वारा बनाये गये 24 गुरुओं की चर्चा करते हुए गुरू तत्व पर स विस्तार चर्चा की। उन्होंने बताया कि गुरू पूर्णिमा शिष्य का गुरू के प्रति समीक्षा का महापर्व है।गुरु की ऊर्जा, उसका प्रकाश, उसका प्रेम, उसका मुस्कराना, उसकी उपस्थिति मात्र से शिष्य इतना पोषित हो जाता है और बदले में वह कुछ दे नहीं सकता। ऐसा कुछ है ही नहीं जो वह दे सके। एक क्षण आता है जब वह गुरु के प्रति इतना अनुग्रहित होता है कि वह अपना सिर गुरु के चरणों में झुका देता है। उन्होंने कहा कि सद्गुरु तुम्हें कंप्यूटर बना देने में उत्सुक नहीं है। उसकी उत्सुकता है कि तुम स्वयं प्रकाश बनो, तुम्हारा अस्तित्व प्रामाणिक बने, एक अमर अस्तित्व- मात्र जानकारी नहीं, दूसरों ने जो कहा है वह नहीं, बल्कि तुम्हारा स्वयं का अनुभव।
जैसे-जैसे शिष्य सदगुरु के निकट और निकट आता है, रूपांतरण का एक बिंदु और आता है जब शिष्य भक्त बन जाता है।
और इन सभी सोपानों में एक सौंदर्य है।
शिष्य हो जाना एक महान क्रांति है, लेकिन भक्त होने की तुलना में कुछ भी नहीं। कथाव्यास राधेश्याम शास्त्री जी ने कहा कि किस क्षण शिष्य परिवर्तित होकर भक्त बनता है? गुरु की ऊर्जा, उसका प्रकाश, उसका प्रेम, उसका मुस्कराना, उसकी उपस्थिति मात्र से शिष्य इतना पोषित हो जाता है और बदले में वह कुछ दे नहीं सकता। ऐसा कुछ है ही नहीं जो वह दे सके। एक क्षण आता है जब वह गुरु के प्रति इतना अनुग्रहित होता है कि वह अपना सिर गुरु के चरणों में झुका देता है।

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