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: धर्म हमें स्वार्थ नहीं त्याग सिखाता है :रत्नेशप्रपन्नाचार्य

बमबम यादव

Mon, Feb 27, 2023

जगद्गुरू जी ने कहा, पत्नी का अधिकार यदि पति के सुख में है तो दुख में भी होना चाहिये, हमें आगे बढ़कर एक दूसरे की विपत्ति का सहायक बनना चाहिये

अयोध्या। रामराज्य की भूमिका त्याग और साधना से शुरू होती है।श्रीराम साधक बनकर तपस्वी बनकर वन को गये ।जीवन में जबतक हम तप को ,श्रम को ,त्याग को नहीं अपनायेंगे तब श्रेष्ठ जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। उक्त उद्गार प्रख्यात कथावाचक जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य ने जानकी महल ट्रस्ट में आयोजित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण  के अष्टम दिवस में कही। जगद्गुरू जी ने कहा कि श्रीराम के साथ माता सीता भी वन को गयी।माता सीता ने कहा पत्नी का अधिकार यदि पति के सुख में है तो दुख में भी होना चाहिये।हमें आगे बढ़कर एक दूसरे की विपत्ति का सहायक बनना चाहिये।समान सुखदुखयो।हम हर किसी सुख में हिस्सेदारी तो चाहते हैं पर दुख में साथ छोड़ देते है।हमें अपने देश की विपत्ति में देश के साथ खड़ा होना चाहिये रामायण की कथा हमें ये शिक्षा देती है।धर्म हमें स्वार्थ नहीं त्याग सिखाता है।भगवान श्रीराम के अवतरण के पूर्व भी राज्य तंत्र था और राजा प्रजापालन भी करते थे, किंतु वे प्रजा की उनके किसी कार्य की क्या प्रतिक्रिया होगी, इसका कदाचित ही चिंतन करते थे। भगवान श्रीराम ने प्रजा की इच्छानुकूल राज्य व्यवस्था की थी। उन्होंने कहा कि वनगमन के समय जब अनुज लक्ष्मणजी साथ चलने का आग्रह करने लगे, तब प्रजातंत्र का अनन्यतम सूत्र प्रकट करते हुए प्रभु श्रीराम कहते हैं - 'हे भाई ! तुम यहीं अयोध्या में रहो और सबका परितोष करो, अन्यथा बहुत दोष लगेगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है। ऐसी नृप नीति होने के कारण ही उनके राज्य में सभी सुखी रहते थे। कथा से पूर्व आयोजक कुसुम सिंह व डॉ० दिनेश कुमार सिंह ने व्यास पीठ का पूजन किया।

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