: प्रियाप्रतीम रास कुंज के महंत बने श्रीकांत प्रत्यूष दास
Wed, May 25, 2022
रामनगरी के संतो ने दिया कंठी चादर
अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या के राजघाट स्थित प्रियाप्रीतम रासकुंज का नया महंत श्रीकांत प्रत्यूष दास काे संत-महंत और धर्माचार्याें ने कंठी, चद्दर, तिलक देकर महंती प्रदान किया। आश्रम के वयाेवृद्ध महंत परमानंद दास महाराज ने कहा कि उन्हें एक याेग्य उत्तराधिकारी की तलाश थी। जाे मंदिर का कार्यभार संभाल व यहां की व्यवस्था सुचारू रूप से चला सके। वह तलाश अब जाकर पूरी हुई। मठ के महंत पद पर उनके शिष्य श्रीकांत प्रत्यूष दास की नियुक्ति की गई है। उनसे आशा है कि वह मंदिर की व्यवस्था अच्छे ढंग से चलायेंगे। प्रत्यूष दास ने कहा कि उन्हें आश्रम की बागडाेर साैंपी गई है। अयाेध्या के विशिष्ट संताें ने महंती दी है। इस पर वह खरा उतरेंगे। ऐसा काेई कार्य नही करेंगे, जिससे महंत पद तथा मंदिर की प्रतिष्ठा पर आंच आए। हमेशा पद की गरिमा बनाकर रखेंगे। मठ में ठाकुर जी और गाै, संत, विद्यार्थी, आगंतुक सेवा भली-भांति चलती रहेगी। सदैव मंदिर के उत्तराेत्तर विकास में संकल्पित रहेंगे। अंत में नवनियुक्त महंत आए हुए संताें का स्वागत-सत्कार किया। महंताई समारोह में जगतगुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य, श्रीरामवल्लभाकुंज अधिकारी राजकुमार दास, पूर्व डीजीपी बिहार गुप्तेश्वर पांडेय, रसिक पीठाधीश्वर महंत जन्मेजय शरण, बड़ा भक्तमाल महंत स्वामी अवधेश कुमार दास, नयामंदिर शीशमहल पीठाधीश्वर महंत रामलाेचन शरण, महंत अर्जुन दास, महंत अजय दास, महंत कमलादास रामायणी, वीरेंद्र दास, जगन्नाथ दास, नागा रामलखन दास, पराशर महाराज, महेश शुक्ला, संत प्रसाद मिश्रा, विदिशा से लखन शास्त्री आदि संत-महंत एवं भक्तगण माैजूद रहे।
: भागवत कथा भगवान का वांग्मय स्वरूप है: रामानन्दाचार्य
Wed, May 25, 2022
पूराबाजार के ग्राम रहेरवा नारा में समारोह पूर्वक भागवत कथा का हुआ शुभारम्भ
अयोध्या। भागवत कथा श्रवण मात्र से हमारे एक जन्म नहीं अपितु हमारे कई जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। यदि हमें आंतरिक शांति चाहिए तो अपने कर्तव्य का सदा ही शुद्ध मन से करने की चेष्टा बढ़ानी होगी। साथ ही उस परमात्मा को याद करने के लिए हमें कुछ समय अवश्य निकालना होगा, ताकि हमारे अंदर स्वच्छ विचारों का उदय हो सके। उक्त बातें जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी महाराज ने पूराबाजार रहेरवा नारा में भागवत कथा के शुभारंभ में कही। अयोध्या के पूराबाजार स्थित ग्राम रहेरवा नारा में आज समारोह पूर्वक भागवत कथा का शुभारम्भ कियागया। कथा के प्रथम दिवस जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करना संसार का सर्वश्रेष्ठ सत्कर्म है, यह भगवान का वांग्मय स्वरूप है, जो जन्म जन्मांतर के पुण्य उदय होने पर प्राप्त होता है। ना भागवत की नियती ब्रह्म होना है, यह देव दुर्लभ है किंतु मनुष्यों को सुलभ होकर ज्ञान गंगा के रूप में प्रवाहित हो रही है। हर मनुष्य को समाज में अच्छा काम करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि कर्म ही प्रधान है, बिना कर्म कुछ संभव नहीं होता है, जो मनुष्य अच्छा कर्म करता है उसे अच्छा फल मिलता है। बुरे कर्म करने वाले को बुरा फल मिलता है। इसलिए सभी को अच्छा कर्म ही करना चाहिए।जगद्गुरु जी ने कहा कि भागवत को सुनने से पाप नष्ट होता है। भागवत कथा एक ऐसा अमृत है कि इसका जितना भी पान किया जाए तब भी तृप्ति नहीं होती। कहा कि भक्ति के दो पुत्र हैं, एक ज्ञान दूसरा वैराग्य भक्ति बड़ी दुखी थी, उसके दोनों पुत्र वृद्धावस्था में आकर भी सोये पड़े हैं। वेद वेदान्त का घोल किया गया, किन्तु वे नहीं जागे, यह बड़ा विचित्र और सुक्ष्म विचार का विषय है। भक्ति बड़ी दुखी थी कि यदि वे नहीं जागे तो यह संसार गर्त में चला जायएगा। भागवत कथा पौराणिक होती है। हमें अहंकार को त्याग कर ईश्वर की भक्ति करनी होगी, इसी से शांति की प्राप्ति होगी। कथा के पूर्व व्यासपीठ का पूजन मुख्य यजमान श्रीमती मिथलेश सिंह व अखंड प्रताप सिंह ने किया। महोत्सव संचालन गौरव दास शास्त्री व शिवेंद्र शास्त्री ने किया।इस मौके पर बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।
: श्रीराम धर्म की प्रतिमूर्ति है: रत्नेशप्रपन्नाचार्य
Mon, May 23, 2022
भरत जी की तपस्थली ,नन्दीग्राम भरतकुंड पर स्वामी रत्नेशप्रपन्नाचार्य कर रहे श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा की अमृत वर्षा
द्धितीय दिवस पर कथाव्यास ने कहा, जिस देश में युवा का जीवन धर्म के लिये समर्पित हो जाये वह समाज व राष्ट्र धन्य हो जाता है
अयोध्या। श्रीलक्ष्मण का चरित्र अर्पण ,समर्पण और विसर्जन का चरित्र है।उन्होंने अपने जीवन को श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया है।श्रीराम धर्म की प्रतिमूर्ति है।राम धर्म के स्वरूप है।राम सनातन धर्म के प्रतीक है।राम धर्म की आत्मा है। उक्त बातें जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी महाराज ने भरत जी की तपस्थली ,नन्दीग्राम,भरतकुंड पर श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा के द्धितीय दिवस में कही। स्वामी रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने बताया कि लक्ष्मण का जीवन धर्म के प्रति समर्पित है।देश के हर युवा के प्रतीक है लक्ष्मण।जिस देश में युवा का जीवन धर्म के लिये समर्पित हो जाये वह समाज व राष्ट्र धन्य हो जाता है।श्रीराम राष्ट्र के मंगल के लिये यात्रा करते हैं और लक्ष्मण उनके सहयोगी है।जिस देश के युवा राष्ट्र धर्म और सेवा धर्म के समर्पित होते है वही रामराज्य की स्थापना होती है। उन्होंने कहा कि लक्ष्मण शब्द का अर्थ होता है जिसका मन लक्ष्य में लगा हो।जिस युवा का मन लक्ष्य से भटक जाता है वो कभी लक्ष्मण नहीं बन सकता।लक्ष्य विहीन युवा,समाज और राष्ट्र नष्ट हो जाता है।जीवन का जो लक्ष्य है उसके प्रति हमारा जीवन पूर्ण समर्पित होना चाहिये। जगद्गुरू रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि धैर्य और संयम सफलता की कुंजी है। जब मन इन्द्रियों के वशीभूत होता है, तब संयम की लक्ष्मण रेखा लाँघे जाने का खतरा बन जाता है, भावनाएँ अनियंत्रित हो जाती हैं। असंयम से मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है इंसान असंवेदनशील हो जाता है मर्यादाएँ भंग हो जाती हैं। इन सबके लिए मनुष्य की भोगी वृत्ति जिम्मेदार है। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या असंयम के जनक हैं व संयम के परम शत्रु हैं। इसी तरह नकारात्मक आग में घी का काम करती है। वास्तव में सारे गुणों की डोर संयम से बँधी हुई होती है। जब यह डोर टूटती है तो सारे गुण पतंग की भाँति हिचकोले खाते हुए व्यक्तित्व से गुम होते प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि मात्र कुछ क्षणों के लिए असंयमित मन कभी भी ऐसे दुष्कर्म को अंजाम देता है कि पूर्व में किए सारे सत्कर्म उसकी बलि चढ़ जाते हैं। असंयम अनैतिकता का पाठ पढ़ाता है। अपराध की ओर बढ़ते कदम असंयम का ही परिणाम हैं। इन्द्रियों को वश में रखना, भावनाओं पर नियंत्रण रखना संयम को परिभाषित करता है। मानव को मानव बनाए रखने में यह मुख्य भूमिका निभाता है।विवेक, सहनशीलता, सद्विचार, संवेदनशीलता, अनुशासन तथा संतोष संयम के आधार स्तंभ हैं। धैर्य और संयम सफलता की पहली सीढ़ी हैं। जगद्गुरु जी ने कहा कि अच्छे संस्कार, शिक्षा, सत्संग आदि से विवेक को बल मिलता है। मेहनत, सेवाभाव, सादगी से सहनशीलता बढ़ती है। चिंतन, मंथन आदि से विचारों का शुद्धिकरण होता है। इस प्रकार प्रभु की प्रार्थना, भक्ति से मनुष्य संवेदनशील हो जाता है। अतः दृढ़ निश्चय से ही मानव जीवन अनुशासित होता है। रामकथा में मणिराम दास छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास,संत परमात्मा दास सहित बड़ी संख्या में कथा प्रेमी मौजूद रहें।