Monday 14th of September 2026

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दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में 42 शोध-पत्र प्रस्तुत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर विशेषज्ञों ने रखे

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रामायण विश्वविद्यालय में ईरान-इजराइल संघर्ष पर भारत की विदेश नीति पर : दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में 42 शोध-पत्र प्रस्तुत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर विशेषज्ञों ने रखे

रामायण विश्वविद्यालय में ईरान-इजराइल संघर्ष पर भारत की विदेश नीति पर मंथन

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में 42 शोध-पत्र प्रस्तुत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर विशेषज्ञों ने रखे विचार

अयोध्या। ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच भारत की विदेश नीति के सामने क्या चुनौतियां हैं और बदलती परिस्थितियों में देश अपने हितों को कैसे साध सकता है, इस पर अयोध्या में दो दिन तक चर्चा हुई। महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने पश्चिम एशिया की स्थिति को भारत की ऊर्जा, व्यापार और विदेश नीति के संदर्भ में देखा।

महर्षि महेश योगी रामायण विश्वविद्यालय और इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (आईसीडब्ल्यूए), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘ईरान-इजराइल संघर्ष : भारत की विदेश नीति पर मध्य पूर्व का प्रभाव’ विषय पर हुई संगोष्ठी का रविवार को समापन हुआ। चार तकनीकी सत्रों में शिक्षकों, विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन हिस्सा लिया। कुल 42 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए।

संगोष्ठी में कहा गया कि पश्चिम एशिया की स्थिति का असर ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत के ऊर्जा, आर्थिक और रणनीतिक हित इस क्षेत्र से जुड़े होने के कारण बदलती परिस्थितियों को भारतीय नजरिये से समझना जरूरी है। वक्ताओं ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए स्वतंत्र, संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

दूसरे दिन तीसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता का. सु. साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रसाद त्रिपाठी ने की। प्रो. कविता सिंह, विभागाध्यक्ष, प्राचीन इतिहास विभाग, का. सु. साकेत पीजी कॉलेज विषय विशेषज्ञ रहीं। इस सत्र में 12 शोधार्थियों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

चौथे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दर्शन नगर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ द्विवेदी ने की। राजनीति विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. निलय तिवारी विषय विशेषज्ञ रहे। इसमें शोधार्थियों ने संघर्ष के सामाजिक, राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभावों पर अपने शोध प्रस्तुत किए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. ओम नाथ विमली ने मध्य पूर्व की बदलती परिस्थितियों, भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं और नई वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में अकादमिक विमर्श की भूमिका पर विचार रखा।

समापन समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भानु प्रताप सिंह ने की। प्रति कुलपति डॉ राजीव कुमार मिश्रा ने विद्यार्थियों में अध्ययन और स्वाध्याय की आदत विकसित करने पर जोर दिया। मुख्य अतिथि डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सुरेंद्र मिश्र रहे। ग्वालियर स्थित माधव स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. शिव कुमार शर्मा ऑनलाइन जुड़े।

विश्वविद्यालय की अधिष्ठाता-शैक्षणिक डॉ. रीता जायसवाल ने आभार जताया। आयोजन के लिए कुलाधिपति अजय प्रकाश श्रीवास्तव, मेम्बर बीओजी राहुल भारद्वाज और पंकज शर्मा ने बधाई दी।

तेल की कीमतों से जुड़ा भारत का हित

संगोष्ठी में ऊर्जा सुरक्षा पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि पश्चिम एशिया की स्थिति को भारत की ऊर्जा जरूरतों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर तेल की कीमतों में बदलाव हो सकता है, जिसका असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। इसलिए बदलती परिस्थितियों के बीच भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। चर्चा में राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर आगे की नीति तैयार करने पर जोर दिया गया।

पश्चिम एशिया में घटनाक्रम का असर समुद्री व्यापार पर भी पड़ सकता है। संगोष्ठी में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री मार्गों से जुड़े पहलुओं पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि व्यापारिक रास्तों में बदलाव या दबाव का असर आपूर्ति व्यवस्था तक पहुंच सकता है। भारत के आर्थिक हितों को देखते हुए बदलते हालात पर नजर रखना जरूरी है। इसी क्रम में संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग को क्षेत्रीय शांति और सहयोग के लिए महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया।

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