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रामकथा में गूंजे त्याग, सेवा और मर्यादा के संदेश, भरत-केवट प्रसंग सुन : मणिराम दास छावनी और सावर्थिया सेवा सदन में कथा व्यासों ने बताया— श्रीराम का जीवन आदर्श मानवता का मार्गदर्शन, निष्काम

रामकथा में गूंजे त्याग, सेवा और मर्यादा के संदेश, भरत-केवट प्रसंग सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु

मणिराम दास छावनी और सावर्थिया सेवा सदन में कथा व्यासों ने बताया— श्रीराम का जीवन आदर्श मानवता का मार्गदर्शन, निष्काम भक्ति से ही मिलती है भगवत कृपा

अयोध्या। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर रामनगरी में आयोजित विभिन्न श्रीरामकथा महोत्सवों में श्रद्धा, भक्ति और मर्यादा के संदेश की अमृतवर्षा हो रही है। मणिराम दास छावनी स्थित धर्म मंडप में अग्रवाल समाज सेवा ट्रस्ट एवं श्री लक्ष्मी नाथ सेवा समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित श्रीराम कथा तथा सावर्थिया सेवा सदन में चल रहे “तुलसी कथा रघुनाथ की” श्रीरामकथा महोत्सव में कथा व्यासों ने भगवान श्रीराम के त्याग, सेवा, प्रेम और आदर्श जीवन पर प्रकाश डाला।

धर्म मंडप में व्यासपीठ से जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामदिनेशाचार्य जी महाराज ने राम वनवास, भरत मिलाप और राम-केवट संवाद का मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि भरत जैसा भाई इस युग में मिलना दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम मर्यादा की स्थापना के लिए मानव रूप में अवतरित हुए और पिता की आज्ञा का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक वनगमन स्वीकार किया।

उन्होंने केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि जब प्रभु श्रीराम गंगा पार करने के लिए नाव मांगते हैं तो केवट पहले उनके चरण पखारने की जिद करता है। भगवान के प्रति उसकी निष्कलंक भक्ति और प्रेम सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। स्वामी रामदिनेशाचार्य ने कहा कि भगवान प्रेम और समर्पण का भाव स्वीकार करते हैं तथा निष्काम भक्ति करने वालों का सदैव कल्याण करते हैं।

उन्होंने कहा कि भरत ने भगवान राम के वनवास के दौरान राजसुख त्यागकर उनकी खड़ाऊं को सिंहासन पर स्थापित किया और स्वयं तपस्वी जीवन व्यतीत किया। यह त्याग और भाईचारे का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि श्रीराम कथा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मन के विकारों को दूर कर भगवत प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली दिव्य साधना है।

वहीं सावर्थिया सेवा सदन में आयोजित “तुलसी कथा रघुनाथ की” के छठवें दिवस पर जगद्गुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने भगवान श्रीराम के वनगमन, पितृभक्ति, माता सीता के त्याग और लक्ष्मण जी की सेवा भावना का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन आदर्श मानव जीवन का दिव्य मार्गदर्शन है।

कथा में बताया गया कि महाराज दशरथ द्वारा कैकेयी को दिए गए वचनों की मर्यादा निभाने के लिए श्रीराम ने बिना किसी विरोध के चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। यह प्रसंग परिवार, संस्कार और माता-पिता के सम्मान का संदेश देता है।

माता सीता के वनगमन प्रसंग का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने कहा कि सच्ची जीवनसंगिनी वही होती है जो सुख-दुख दोनों में साथ निभाए। माता सीता ने राजवैभव त्यागकर समर्पण और पतिव्रत धर्म का आदर्श प्रस्तुत किया। वहीं लक्ष्मण जी की सेवा भावना का उल्लेख करते हुए कहा गया कि प्रेम में अधिकार नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण का भाव होना चाहिए।

कथा के दौरान केवट प्रसंग का वर्णन सुन श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कथा व्यासों ने कहा कि ईश्वर को धन और वैभव नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम, सेवा और निर्मल भक्ति प्रिय है। रामकथा स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है और पूरा वातावरण राममय बना हुआ है।

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