साधना, ज्ञान और संयम की मिसाल बनीं चंदनामती माता, 38वें दीक्षा दिवस : दिगंबर जैन मंदिर में मनाया गया दीक्षा एवं प्रेरणा दिवस, देशभर से पहुंचे श्रद्धालु; 250 से अधिक ग्रंथों की रचना कर जैन
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Sun, Aug 23, 2026
साधना, ज्ञान और संयम की मिसाल बनीं चंदनामती माता, 38वें दीक्षा दिवस पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
दिगंबर जैन मंदिर में मनाया गया दीक्षा एवं प्रेरणा दिवस, देशभर से पहुंचे श्रद्धालु; 250 से अधिक ग्रंथों की रचना कर जैन ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने वाली साध्वी के योगदान को किया नमन
अयोध्या। जैन धर्म की प्रज्ञाश्रमणी साध्वी चंदनामती माता के 38वें दीक्षा दिवस पर रविवार को रामनगरी में श्रद्धा और अनुराग का भाव देखने को मिला। दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित समारोह को अनुयायियों ने दीक्षा दिवस के साथ-साथ प्रेरणा दिवस के रूप में मनाया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और अनुयायियों ने साध्वी चंदनामती माता के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए उनके दीर्घ साधना जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प लिया।
समारोह में जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी 92 वर्षीय गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता के संघ से जुड़े संत-महात्माओं एवं देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए अनुयायियों की मौजूदगी रही। स्थानीय जैन तीर्थों सहित देश के दर्जनों प्राचीन तीर्थ स्थलों के उन्नायक पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी, इंजीनियर गुणसागर जैन, कैलाशचंद्र जैन, लखनऊ व्यापार मंडल के उपाध्यक्ष विनोद माहेश्वरी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और मंगल आरती से हुआ। इसके बाद श्रद्धालुओं ने चंदनामती माता सहित गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता का विधि-विधान से पूजन किया। गोरखपुर के पुखराज पांड्या ने पाद प्रक्षालन की रस्म संपन्न की। वहीं सरोजकुमारी जैन एवं कपिल जैन ने संयम की प्रतीक पिच्छी भेंट की। मोर पंख से निर्मित पिच्छी जैन साधु-साध्वियों के संयम और अहिंसा का प्रतीक मानी जाती है, जिसे दीक्षा के बाद साधु-साध्वियां अपने साथ रखते हैं।चंदनामती माता को शास्त्र भेंट करने की रस्म कृषि वैज्ञानिक डा. राधा जैन एवं दिनेश जैन ने संपन्न की। इस दौरान मंदिर परिसर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का वातावरण बना रहा। अनुयायियों ने चंदनामती माता के दीर्घ साधना जीवन और समाज के प्रति उनके योगदान को स्मरण करते हुए उनके व्यक्तित्व-कृतित्व को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
बाराबंकी जिले के टिकैतनगर में 68 वर्ष पूर्व जन्मीं चंदनामती माता का बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव रहा। उन्होंने महज 11 वर्ष की आयु में गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता के संघ में प्रवेश किया। इसके बाद ज्ञान, आराधना और संयम के पथ पर निरंतर आगे बढ़ती रहीं। वर्ष 1989 में उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के बाद उन्होंने संपूर्ण देश की पदयात्रा कर जैन धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।
उनकी रचनाधर्मिता भी उन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। जैन धर्म और दर्शन पर केंद्रित करीब 250 ग्रंथों की रचना उनके गहन अध्ययन और ज्ञान का परिचायक है। अनेक ग्रंथों की टीका लिखने के साथ ही संस्कृत भाषा पर उनकी पकड़ भी विशिष्ट मानी जाती है। उनके विद्वतापूर्ण योगदान को देखते हुए वर्ष 2012 में उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि से भी अलंकृत किया गया।चंदनामती माता ने जैन धर्म के ज्ञान और दर्शन को आधुनिक तकनीक के माध्यम से व्यापक स्तर तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘इन्साइक्लोपीडिया आफ जैनिज्म’ वेबसाइट के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। उनके अनुयायियों के अनुसार उनका संपूर्ण जीवन ज्ञान, संयम, साधना और सेवा का संदेश देता है।डा. जीवनप्रकाश के अनुसार जैन समाज में गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता और चंदनामती माता की जोड़ी को प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की महान पुत्रियों ब्राह्मी और सुंदरी से तुलना की जाती है। ब्राह्मी को भाषा एवं लिपि तथा सुंदरी को अंक एवं गणित के ज्ञान से जोड़ा जाता है। इसी प्रकार ज्ञानमती और चंदनामती माता ने जैन धर्म की ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। 38वें दीक्षा दिवस पर आयोजित समारोह ने इसी साधना, ज्ञान और संयम की परंपरा को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया।
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