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: रामायण का मूल उद्देश्य एक आदर्श मानव का चरित्र प्रस्तुत करना: चिदम्बरानन्द सरस्वती

बमबम यादव

Thu, Jan 18, 2024

जिन शंकराचार्य को लग रहा है कि शास्त्र सम्मत काम नहीं हो रहा, मुहूर्त को लेकर कोई दिक्कत है तो उन्हें मैं 21 तारीख से पहले आमंत्रित करता हूं कि वे यहां पर आए खुद मुआयना करें:कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी

कथा को सम्बोधित करते श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी
रामकथा का दीप प्रज्वलन के साथ शुभारंभ करते श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी व राम महल वैदेही भवन पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर महंत रामजी शरण

अयोध्या। अयोध्या में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा की घड़ी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है। लोगों में मंदिर उद्घाटन को लेकर उत्सुकता बढ़ती जा रही है। प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने लिए देशभर से करीब 8 हजार लोगों को आमंत्रित किया गया है। जिनमें साधु-संत, नेता, अभिनेता और खेल जगत से जुड़े लोगों के नाम शामिल हैं। वहीं चारों शंकराचार्यों ने प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। जिस पर अब राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने कहा है कि जिन शंकराचार्य को लग रहा है कि शास्त्र सम्मत काम नहीं हो रहा है। मुहूर्त को लेकर कोई दिक्कत है तो उन्हें मैं 21 तारीख से पहले आमंत्रित करता हूं कि वे यहां पर आए खुद मुआयना करें, देखें और उन्हें जो भी लगता है शास्त्र सम्मत नहीं है वह हमें सलाह दें। उनकी सलाह हम लोग मानेंगे। उक्त बातें रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने वैदेही भवन में चल रहे श्रीराम कथा में कही। राम महल वैदिक भवन में मुम्बई से चलकर आये सनातन धर्म प्रचारक एवं प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक व संस्थापक चिद्ध्यानम आश्रम व गौशाला, चिदसाधना साध्यम ट्रस्ट, मुंबई के महामंडलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज व्यासपीठ से श्री रामकथा की अमृत वर्षा कर रहें है। कथा के दूसरे दिवस स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि रामायण का मूल उद्देश्य एक आदर्श मानव का चरित्र प्रस्तुत करना है। अतः इस कथा का प्रारम्भ श्रेष्ठतम मनुष्य की खोज से होता है।उन्होंने कहा कि यह विश्व में मानववाद के विचार का पहला बीज पडने की घटना है, जब वाल्मीकि अपनी रामकथा की भूमिका और आधार सुनिश्चित करते हैं। उनकी जिज्ञासा न तो किसी देव, गंधर्व, सुर, असुर के बारे में हैं, न वे किसी अतीत की कथा में रमना चाहते हैं। उनका उद्देश्य अलौकिक चमत्कारों के बल पर कार्यसिद्धि प्राप्त करने की कथा लिखना भी नहीं है। स्वामीजी ने कहा कि वाल्मीकि के पिता वरुण थे, जो महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र थे। इनकी माता का नाम चर्षणी था और यह भृगु ऋषि के भाई थे। वरुण का नाम प्रचेत होने के कारण वाल्मीकि को प्राचेतस् भी कहा जाता है। इनका आश्रम तमसा नदी के तट पर था। यह जीवनवृत्त मानव के उत्थान–पतन का ज्वलंत उदाहरण है, कि कुसंगति कैसे जीवन को पतित कर कलंकित कर देती है और सत्संगति कैसे जीवन को उन्नति की ओर ले जाकर उज्ज्वल बना देती है। कैसे वह एक खलनायक से महानायक में रूपांतरित हो गए, पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है।

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