: हर्षोल्लास के साथ मनाया गया मोहम्मद साहब का जन्मदिन
Sun, Oct 9, 2022
शान शौकत से निकला जुलूस-ए-मोहम्मदी,जगह-जगह पर आयोजित हुए लंगर-ए-रसूल
सर्व धर्म समभाव सेवा समिति के तत्वाधान में हुआ नातिया मुकाबला, शामिल हुए 1 दर्जन से अधिक अंजुमन,दिया गया इनाम
प्रबंधक समाजसेवी मोहम्मद इरफान उर्फ नन्हे मियाँ ने सभी का पुष्प वर्षा कर किया स्वागत
अयोध्या। अल्लाह के आखिरी नबी हजरत मोहम्मद साहब के जन्मदिवस पर आयोजित जश्न ईद मीलादुन्नबी के मौके पर रविवार को शहर में जुलूस-ए-मोहम्मदी अपनी परम्परागत अंदाज शान के साथ निकाला गया। जामा मस्जिद टाटशाह से निकाला गया जश्ने ईद मिलादुन्नबी का पर्व जुलूस -ए-मोहम्मदी सुबह 8 बजे से ही जामा मस्जिद टाटशाह के पेश इमाम हज़रत मौलाना शमशुल कादरी साहब की सरपरस्ती में जुलूस -ए- मोहम्मदी का जुलूस सुभाषनगर से बड़ी ही शानों - शौकत के साथ गुलिस्ता साल की तरह इस साल भी निकाला गया । जुलूस में सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
रामनगरी अयोध्या में जश्ने ईद मिलादुन्नबी के मौके पर निकलने वाला जुलूस ए मोहम्मदी शनिवार को बड़े ही धूमधाम और अकीदत के साथ निकाला गया। अशर्फी भवन चौराहे पर सर्व धर्म समभाव सेवा समिति के तत्वाधान में नातिया मुकाबला का आयोजन किया गया। इसमें शामिल 1 दर्जन से अधिक अंजुमन को इनाम देकर उनका प्रोत्साहन किया गया। इस मौके पर समिति के प्रबंधक समाजसेवी मोहम्मद इरफान अंसारी नन्हे मियाँ, मोहम्मद इमरान अंसारी व सुल्तान अंसारी ने सभी का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। समाज सेवी मो इरफान नन्हे मियाँ ने बताया कि हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल है अयोध्या। अयोध्या मे हिन्दू मुस्लिम दोनो धर्म के लोगो ने मिलकर जश्ने ईद मिलादुन्नबी मनाया।
: ईद मिलादुन्नबी को झंडों और जुलूस तक सीमित मत रखिए: सुल्तान अंसारी
Sun, Oct 9, 2022
दुनिया बदल रही है अब मुसलमानों को भी अपने को बदलना चाहिए है।रामनगरी अयोध्या के समाजसेवी फिल्म प्रड्यूसर सुल्तान अंसारी ईद मिलादुन्नबी की मुबारकबाद देते हुए अपने समाज को तरक्की की ओर आगे बढ़ने की नसीहत देते हुए कहते है कि आलम-ए-इसानियत के पैगम्बर.. शांति और सद्भावना के पैरोकार पैगंबर मुहम्मद की यौम-ए-पैदाइश मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार है।
इस त्योहार के पारंपरिक रंगों में बड़े-बड़े पराठे.. रंगीन हलवा.. झंडे और जुलूस…. ये क्या??? ये ही काफी नहीं है।
जदीद दौर के कुछ तकाज़े होते है। डिबेट होती। डोनेशन के कार्यक्रम होते। मुसलमान अपने गैर मुस्लिम भाइयों के साथ अपने रसूल के अस्ल पैगाम को साझा करते। विज्ञान, शिक्षा, त्याग, शांति, सद्भावना, महिलाओं के सम्मान, मुल्कपरस्ती पर रसूल की हदीसों से दुनिया को वाकिफ किया जाता। इस्लाम शांति के लिए है विध्वंस के लिए नहीं। जेहाद और पर्दा जनकल्याणकारी और डिफेंसिव है। इन बातों की व्याख्या होती तो लगता कि मुसलमान भी वक्त और जरूरत के हिसाब से बदल रहा है।
: कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में पौराणिक आख्यानों का अपमान
Sun, Oct 9, 2022
प्रभु श्रीराम के चरित्र में न तो आक्रामकता थी, न ही रावण के चरित्र में कमीनापन
अनंत विजय। फिल्म आदिपुरुष के अंश में रावण को देखकर कुछ लोग ये कह रहे हैं कि ये रावण कम खिलजी ज्यादा लग रहा है। खितुलसीदास, वाल्लमीकिजी लगे या कोई और लेकिन रावण की लोक में प्रचलित छवि से बिल्कुल अलग है। रावण के गुणों के बारे में वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों ने विस्तार से लिखा है। लंकेश इतना बड़ा और पराक्रमी राजा था कि उसने तीनों लोक को जीता था। वो बहुत बड़ा शिव भक्त था, तपस्वी था लेकिन अहंकारी था। फिल्म आदिपुरुष में जो रावण बनाया गया है वो अहंकारी तो बिल्कुल नहीं दिखता है, हां उसके चेहरे पर, उसकी संवाद अदायगी या हावभाव में कमीनापन अवश्य दिखता है। रावण अहंकारी अवश्य था लेकिन उसके कमीनेपन का चित्रण न तो वाल्मीकि ने किया है और न ही तुलसीदास ने। आदिपुरुष फिल्म के निर्देशक ने किस तरह से रावण के चरित्र को गढ़ा है, उनका सोच क्या था ये तो वही बता सकते हैं। लोक में व्याप्त लंकेश की छवि को इस तरह से भ्रष्ट करना और फिर उसका हास्यास्पद तरीके से बचाव करके फिल्म से जुड़े लोग अपनी अक्षमता को ढंकने का प्रयास कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम और रामकथा के पात्रों को लेकर वाल्मीकि का जो सोच था या जो तुलसी की अवधारणा थी उसका शतांश भी इस फिल्म में नहीं दिखाई दे रहा है। फिल्म में हनुमान की वेशभूषा को भी आधुनिक बनाने के चक्कर में निर्माता- निर्देशक ने क्या गड़बड़ियां की हैं ये फिल्म प्रदर्शित होने के बाद पता चलेगी। फिलहाल तो जो कुछ दृश्य है जिसको लेकर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां भी गड़बड़ी हुई है।
कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर पौराणिक आख्यानों के चरित्रों को इस तरह से प्रदर्शित कर अपमानित करने की छूट नहीं दी जा सकती है। लोक में व्याप्त छवि से छेड़छाड़ करके फिल्में सफल नहीं हो सकती हैं। कुछ दिनों पूर्व प्रदर्शित फिल्म सम्राट पृथ्वीराज में भी लोक में प्रचलित छवि से अलग दिखाया गया। परिणाम सबके सामने है। अगर उस फिल्म में चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने लोक में व्याप्त कथाओं के आधार पर पृथ्वीराज का चरित्र गढ़ा होता तो सफल हो सकते थे। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने तो पृथ्वीराज रासो पर खुद को केंद्रित रखा लेकिन आदिपुरुष के लेखक और निर्देशक न तो वाल्मीकि के करीब जा सके और न ही तुलसी के। संभव है कि उन्होंने अंग्रेजी की कोई फिल्म देखी होगी और उनको लगा होगा कि तकनीक का प्रक्षेपण करके हिंदी में भी इस तरह की फिल्म बनाई जाए। इन दिनों हिंदू पौराणिक आख्यानों पर आधारित फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही है। निर्माताओं ने सोचा होगा कि रामकथा को तकनीक के सहारे कहा जाए तो सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त किए जा सकते हैं। इस फिल्म से जुड़े लोग ये भूल गए कि राम का जो उद्दात चरित्र भारतीय जनमानस पर अंकित है उसके विपरीत जाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। अगर गंभीरता से फिल्मकार काम करना चाहते थे तो उनको गीताप्रेस गोरखपुर स्थित लीला चित्र मंदिर जाकर वहां लगी तस्वीरों को देखना चाहिए था, इससे उनकी फिल्म के पात्रों को प्रामाणिकता मिलती और लोक को संतोष और उनको सफलता।