Tuesday 22nd of September 2026

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रायगंज जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व की धूम,स्वर्ण जयंती वर्ष में विशेष आराधना राम मंदिर निर्माण की बाधा दूर करने के

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तप से आत्मा उज्ज्वल होती है,भाव विपरीत हों तो‘पात’की ओर बढ़ता है जीवन : रायगंज जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व की धूम,स्वर्ण जयंती वर्ष में विशेष आराधना राम मंदिर निर्माण की बाधा दूर करने के

तप से आत्मा उज्ज्वल होती है, भाव विपरीत हों तो ‘पात’ की ओर बढ़ता है जीवन

रायगंज जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व की धूम,स्वर्ण जयंती वर्ष में विशेष आराधना

राम मंदिर निर्माण की बाधा दूर करने के लिए भी हुआ था इंद्रध्वज मंडल विधान

अयोध्या। आत्मा की निर्मलता और परमात्म पद की प्राप्ति का मार्ग बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि तप, संयम और आत्मसाधना से प्रशस्त होता है। तप आत्मा को उज्ज्वल करता है और कर्मों की निर्जरा का माध्यम बनता है। जब जीवन में तप का भाव विपरीत दिशा में चला जाता है तो आत्मा पतन की ओर अग्रसर होती है। इसी आध्यात्मिक संदेश के साथ रायगंज स्थित जैन मंदिर में चल रहे दश लक्षण महापर्व में मंगलवार को श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म की आराधना की।इंद्रध्वज मंडल विधान के आयोजन के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में इस वर्ष मंदिर परिसर में स्वर्ण जयंती वर्ष मनाया जा रहा है। दस दिवसीय महापर्व में श्रद्धालु क्रमश: दस धर्मों की आराधना, पूजन और स्वाध्याय के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास कर रहे हैं। देश के विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालुओं के पहुंचने से मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है।जैन साध्वी आर्यिका चंदनमती माता ने उत्तम तप धर्म का मर्म समझाते हुए कहा कि दस लक्षण धर्म आत्मा को परमात्मा बनाने का माध्यम है। ‘तप’ केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, बल्कि इच्छाओं, विकारों और विषय-वासनाओं पर विजय प्राप्त करने की साधना है। तप से आत्मा निर्मल होती है और उसके भीतर छिपे आध्यात्मिक प्रकाश का प्रस्फुटन होता है। इसके विपरीत जब जीवन में तप का भाव उलट जाता है तो आत्मा पतन की ओर बढ़ती है। पतित आत्मा को पुन: पावन बनाने के लिए तप धर्म की आराधना आवश्यक है।उन्होंने इंद्रध्वज मंडल विधान की परंपरा और महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस महायज्ञ का शुभारंभ 1976 में गणिनी प्रमुख माता ज्ञानमती ने किया था। विधान के 50 वर्ष पूर्ण होने पर इस वर्ष स्वर्ण जयंती के रूप में विशेष धार्मिक आयोजन किए जा रहे हैं।जैन मंदिर के पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी ने कहा कि दश लक्षण महापर्व का शुभारंभ उत्तम क्षमा धर्म से होता है और दस दिनों की आध्यात्मिक साधना के बाद क्षमावाणी पर्व के साथ इसका समापन होता है। यह पर्व व्यक्ति को बाहरी संसार से कुछ समय के लिए विरत होकर अपने भीतर झांकने और आत्ममंथन करने का अवसर देता है। दस धर्मों की आराधना मनुष्य को संयमित जीवन, सदाचार और सद्कर्मों की ओर प्रेरित करती है।उन्होंने कहा कि पर्व के दौरान श्रद्धालु अपने जीवन में जाने-अनजाने हुए पापकर्मों से विरत होने और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं। यही दश लक्षण धर्म की साधना का मूल उद्देश्य है।इंद्रध्वज मंडल विधान से जुड़े पुराने प्रसंग को साझा करते हुए पूर्व न्यायमूर्ति कैलाश चंद्र चांदीवाल ने बताया कि राम मंदिर निर्माण के दौरान जब विभिन्न प्रकार की बाधाएं सामने आ रही थीं, तब विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल ने माता ज्ञानमती से भेंट कर परिस्थितियों से अवगत कराया था। इसके बाद माता ज्ञानमती ने अपने भक्तों को निर्देश दिए और अयोध्या की धरती पर राम मंदिर निर्माण की बाधाओं को दूर करने के उद्देश्य से भी विधान कराया गया था।लखनऊ सराफा एसोसिएशन के पदाधिकारी आदेश जैन ने कहा कि अयोध्या केवल आस्था की नगरी नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और विविध धार्मिक परंपराओं की समृद्ध भूमि है। यहां विभिन्न धर्मों की अपनी विशिष्ट विरासत है। इन परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखना तथा भावी पीढ़ी तक पहुंचाना सभी का दायित्व है।नागालैंड से पहुंचे रवि सेठी ने कहा कि इंद्रध्वज मंडल विधान में शामिल होकर उन्हें आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की दिशा में नई अनुभूति मिली। विधान व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने की प्रेरणा देता है। मंदिर परिसर में चल रही आराधना और धार्मिक अनुष्ठानों से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है।

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