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: भगवान ऋषभदेव ने किया था ब्राह्मी लिपि का सूत्रपात: ज्ञानमती माता

बमबम यादव

Wed, Jan 17, 2024

भगवान रामलला के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव पर जैन मंदिर रायगंज में छाया उल्लास

अयोध्या। जैनधर्म के अनुसार इस सृष्टि पर षट्काल परिवर्तन चलता रहता है। प्रथम, द्वितीय और तृतीय काल में भोगभूमि विद्यमान रहती है। इन कालों में स्त्री-पुरुष का युगलिया जन्म होता है और जीवन जीने के सभी साधन कल्पवृक्षों से प्राप्त होते हैं। लेकिन चतुर्थ काल का आरम्भ होते ही कल्पवृक्ष शक्तिहीन हो जाते हैं और प्रजा में जीवन जीने के लिए हा-हाकार मच जाता है। ऐसे समय में जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जन्म लेकर इस धरती पर प्रजा को जीवन जीने की कला सिखाते हैं। यही इस युग का आदिकाल कहलाता है और कर्मभूमि प्रारम्भ होती है। उक्त बातें बड़ी मूर्ति-जैन तीर्थ अयोध्या में विराजमान सर्वोच्च जैन साध्वी गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी ने बताते हुए कहा कि भगवान ऋषभदेव ने प्रजा को असि (शस्त्रविद्या), मसि (लेखन विद्या), कृषि (खेती), विद्या (शिक्षा), वाणिज्य (व्यापार) और शिल्प (कला) रूपी छः क्रियाएँ सिखाकर सभी को जीवनदान दिया था। यहीं ष‌क्रियाएँ आज तक इस धरती पर प्रजा अपने जीवन यापन के लिए अपना रही है।
उन्होंने कहा कि इसी प्रकार भगवान ऋषभदेव ने अपने भरत, बाहुबली आदि 101 पुत्रों को विभिन्न 72 कलाएँ सिखाई और इसी क्रम में अपनी सुपुत्री ब्राह्मी को अ, आ, इ, ई आदि अक्षर लिपि तथा दूसरी पुत्री सुन्दरी को 1, 2, 3, 4 आदि अंक लिपि सिखाई। यही आज तक पूरे विश्व में ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी के नाम पर "ब्राह्मलिपि' के रूप में और अंकलिपि "गणित" के रूप में विश्व विख्यात चली आ रही है। इस प्रकार इस अयोध्या के गर्भ में जैनधर्म के ऐसे अनेकों युगादि इतिहास भरे पड़े हैं जिनके कारण यह अयोध्या तीर्थ भूमि जैन समाज द्वारा युगों से सतत् पूजी जा रही है। इन इतिहासों के क्रम में इक्ष्वाकुवंशीय भगवान श्री रामचन्द्र ने भी इस धरती पर जन्म लेकर इस अयोध्या को महान गौरवशाली बनाया है।

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