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स्वामी युगलानन्यशरण का आध्यात्मिक अनुभव सबके लिए प्रकाश स्तंभ है : आचार्य पीठ श्रीलक्ष्मण किला के संस्थापक आचार्य युगलानन्य शरण महाराज की 145वी पुण्यतिथि पर संतों ने किया नमन

स्वामी युगलानन्यशरण का आध्यात्मिक अनुभव सबके लिए प्रकाश स्तंभ है: किलाधीश जी

आचार्य पीठ श्रीलक्ष्मण किला के संस्थापक आचार्य युगलानन्य शरण महाराज की 145वी पुण्यतिथि पर संतों ने किया नमन

अयोध्या। अयोध्या अद्भुत है. यहां संतों की पंरपरा भी विराट है. जो अलग-अलग स्थानों पर भले रहते है लेकिन उनके उद्देश्यों में समानता दिखाई पड़ती है. रसिक परंपरा के आचार्य पीठ श्रीलक्ष्मण किला के संस्थापक आचार्य युगलानन्य शरण ऐसे ही महापुरुष थे. पीठ पर उनकी 145वी पुण्यतिथि सादगीपूर्ण मनाई गई। जिसकी अध्यक्षता वर्तमान किलाधीश महंत मैथिलीरमण शरण ने की।

स्वामी युगलानन्य शरण जी महाराज की तपस्थली श्रीलक्ष्मण किला रसिकोपासना के आचार्य पीठ के रूप में स्थित है. स्वामी जी युगल प्रियाशरण जीवाराम जी महाराज के शिष्य थे. वर्ष 1818 में नालंदा के ईशरामपुर में जन्मे स्वामी युगलानन्य शरण जी का रामानंदीय वैष्णव संप्रदाय में विशिष्ट स्थान है।

आचार्य पीठ श्रीलक्ष्मण किला के किलाधीश श्रीमहंत मैथिलीरमण शरण महाराज ने बताया कि संस्कृत, उर्दू, अरबी एवं गुरुमुखी के अद्वितीय विद्वान होने के साथ ही गायन विद्या में भी गहरी पैठ रखते थे. गोविंद सिंह की जन्मभूमि हरिमंदिर पटना में रहकर गुरुग्रंथ साहब की व्याख्या भी करते रहे. युगलानन्य शरण जी पटना से काशी, चित्रकूट होते हुए अयोध्या आए।

स्वामी युगलानन्य शरण जी ने रघुवर गुण दर्पण, पारस भाग श्रीसीताराम नाम प्रताप प्रकाश, सद्गुरू प्रताप सागर बिंदु, इश्कक्रांति, धामकांति, मधुर मंजमाला, शत सिद्धांत सार समेत 92 ग्रंथों की रचना की है. आनंद की लहर में इस कद्र डूब जाते थे कि गाते-गाते नृत्य करने लगते थे. उन्होंने घृताची कुंड पर 14 महीने का व्रत लेकर सीतारामनाम जप किया था. निरमोहिया से लागी लगनियां उनका प्रिय पद था। किलाधीश महाराज ने कहा कि सदियों बाद भी उनका आध्यात्मिक प्रताप लक्ष्मण किला के रूप में अक्षुण्ण है। उनकी कृतियों में प्रकीर्णित उनका अनुभव साधकों के लिए प्रकाश स्तंभ की तरह प्रेरक है।हनुमत निवास के आचार्य महंत डा मिथिलेश नंदिनी शरण महाराज ने कहा कि भगवान सीताराम के उपासकों के लिए स्वामी युगलानन्य की कृतियों का अध्ययन बेहद आवश्यक प्रतीत होता है।

इस अवसर पर लक्ष्मण किला के अधिकारी सूर्य प्रकाश शरण ने कहा कि परमपूज्य स्वामी युगलानन्य शरण महान साधक के साथ भगवान सीताराम के रहस्य उपासना के क्षितिज पर विलक्षण चिंतक भी माने जाते हैं। नाम कांति, रूप कांति, लीला कांति, धाम कांति आदि सहित अनेक ग्रंथों और साधना के गहन अनुभव के रूप में सामने आए हजारों पदों के प्रणेता स्वामी युगलानन्य शरण के अनुयायियों में रंक से लेकर राजा तक शामिल रहे हैं।अतिथियों का स्वागत लक्ष्मण किलाधीश महंत मैथिलीरमण शरण, हनुमत निवास के महंत डाक्टर मिथिलेश नंदिनी शरण व लक्ष्मण किला के अधिकारी सूर्य प्रकाश शरण ने किया।श्रद्धांजलि देने वालों में मणिरामदास जी की छावनी के उत्तराधिकारी महंत कमलनयनदास, सियाराम किला झुनकी घाट पीठाधीश्वर महंत करुणानिधान शरण, रामवल्लभाकुंज के अधिकारी राजकुमारदास,  विधायक वेदप्रकाश गुप्त, हनुमानगढ़ी से जुड़े महंत रामकुमार दास, संकट मोचन सेना अध्यक्ष महंत संजय दास, महंत बलराम दास, श्रृंगी ऋषि आश्रम पीठाधीश्वर महंत हेमंत दास, महंत गौरीशंकर दास, पूर्व पार्षद हम कब कहन गलत कहा थे मैंने कभी किसी गलत कहा नहीं नमस्कार हमवं हनुमानगढ़ी के पुजारी रमेशदास, महंत छोटू शरण, महंत रामानुजशरण, महंत अंजनीशरण, महंत रामलोचनशरण, मधुकरी संत मिथिलाबिहारी दास, संगीतज्ञ रामनंदन दास, आलोक मिश्रा, प्रियेश दास, मुकेश तिवारी फौजी,पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह के प्रतिनिधि महेंद्र त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में संत साधक मौजूद रहें।

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